*🔥ओ३म्🔥*
*🌷 सृष्टि―संवत् व भारतीय नववर्ष🌷*
*भारतीय नववर्ष* विक्रम संवत् 2075, चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा
वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें कलियुग का प्रथम चरण व्यतीत हो रहा है। अर्थात् इस सातवें मन्वन्तर की सत्ताईस चतुर्युगियां व्यतीत हो चुकी हैं। अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के सत, त्रेता, द्वापर युग बीत चुके हैं। *विक्रम संवत् 2074 में कलियुग के 5117 वर्ष बीत चुके हैं, कलियुग का 5118वाँ वर्ष चल रहा है और वर्त्तमान वर्ष सहित कलियुग के 4,26,883 वर्ष भोगने शेष हैं।*
समय की यह गणना इस प्रकार है। एक सृष्टि काल में चौदह मन्वन्तर भोग के होते हैं। छह मन्वन्तर बीत चुके हैं, यह सातवां चल रहा है। प्रत्येक मन्वन्तर में एकहत्तर चतुर्युगियों का समय है। एक चतुर्युगी में चार युग हैं।
सतयुग में ― 17,28,000 वर्ष
त्रेतायुग में ― 12,96,000 वर्ष
द्वापरयुग में ― 8,64,000 वर्ष
कलियुग में ― 4,32,000 वर्ष
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एक चतुर्युगी में कुल ― 43,20,000 वर्ष
*वर्तमान सृष्टि संवत्―*
बीत चुके छह मन्वन्तर=
43,20,000 × 71 × 6 =
1,84,03,20,000 वर्ष
*सातवें मन्वन्तर के बीते वर्ष*
सत्ताईस चतुर्युगियां = 43,20,000 × 27 =
11,66,40,000 वर्ष
*बीती अट्ठाईसवीं चतुर्युगी*
सतयुग ― 17,28,000
त्रेतायुग ― 12,96,000
द्वापरयुग ― 8,64000
कलियुग ― 5,117
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जोड़ ― 38,93,117 वर्ष
अत: कुल बीते वर्ष = 1,96,08,53,117 वर्ष
इस प्रकार अब 1,96,08,53,118वां (एक अरब, छियानवें करोड़, आठ लाख, तिरेपन हजार, एक सौ अठ्ठारह वां) वर्ष बीत रहा है।
ऊपर बताए चौदह मन्वन्तर यानि 14 × 71= 994 चतुर्युगी का समय सृष्टि में मनुष्यों का भोग काल है। वास्तव में सृष्टि का काल एक हजार चतुर्युगी का है। शेष रही छह चतुर्युगी का समय सृष्टि की रचना और प्रलय करने में व्यतीत होता है। प्रारम्भ के तीन चतुर्युग में सृष्टि रचना, सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अंत के तीन चतुर्युग में सभी प्राणियों का उल्टे क्रम में नाश होता है। अर्थात् सबसे पहले मनुष्य, फिर अन्य स्थलीय जीव, फिर अन्य जलीय और वायवीय प्राणी, फिर पेड़-पौधे नष्ट हो जाते हैं। यह 1000 चतुर्युगी का समय ब्राह्मदिन कहलाता है। इतना ही प्रलय में व्यतीत होता है अर्थात् सृष्टि नहीं रहती। उसे ब्राह्मरात्रि कहते हैं। इस प्रकार ब्राह्मदिन के पश्चात् ब्राह्मरात्रि और ब्राह्मरात्रि के पश्चात् ब्राह्मदिन निरन्तर चलते रहते हैं। यही क्रम सदा से चला आ रहा है।
अत: *वर्तमान सृष्टि में मनुष्य को उत्पन्न हुए, विक्रम संवत् 2074 में 1,96,08,53,118वां वर्ष (एक अरब, छियानवें करोड़, आठ लाख, तिरेपन हजार, एक सौ अठठ्ठारह) चल रहा है।* यही संवत् वेदोत्पत्ति का है अर्थात् इतने ही वर्ष वेदों को उत्पन्न हुए हो गए हैं। (वास्तव में वेदों की उत्पत्ति नहीं होती, वेद-ज्ञान सदा रहता है। जैसे परमात्मा नित्य है, वैसे ही परमात्मा का ज्ञान वेद भी नित्य है। वेदों का आविर्भाव होता है। ये तो कहने में आ जाता है कि वेदों की उत्पत्ति को इतने वर्ष हो गये हैं)। समय की यह गणना ज्योतिष शास्त्र (गणित) के अनुसार है।
*[ साभार - महर्षि दयानन्द रचित "ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका" के आधार पर ]*
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प्रेषक -
*आर्य प्रवीण वैदिक*
मंत्री
आर्य समाज BHEL हरिद्वार
एवं
ज़िला प्रभारी
भारत स्वाभिमान
पतंजलि योगपीठ
हरिद्वार
9359355161