Sunday, November 26, 2017

आज मखमल से कई ज़ख्म अपने सिल रहे जैसे कलयुग की किस्मत ,,, धृतराष्ट्र कई लिख रहे,,

उद्दंड हैं पाखण्ड है
हृदय में अगन प्रचण्ड है
ना ही कोई आकार है,,
ना ही कोई विकार है,,
मनुष्य ही बनने को बैठा ,,
आज अपना चित्रकार है

आज मखमल से कई
ज़ख्म अपने सिल रहे
जैसे कलयुग की किस्मत ,,,
धृतराष्ट्र कई लिख रहे,,

अज्ञान है,,,अहंकार है,,
विश्वास पर ही वार है,,
नैतिकता का लोप है,,,
जाने ये कैसा शोक है,,,
बहु बेटियां,,है डरी डरी,,,
भय डराता बारम्बार है,,,
है नही यहां कृष्ण कोई,,
कोई ना सुनता पुकार है,,,
चीर हरण नित रोज होता,,
जैसे द्रौपदी ही इसका शिकार है
घोर गगन छाया हुआ,,
जैसे सिंह की दहाड़ है,
रोज अर्जुन मर रहे,,
दुर्योधन इतने हैं खड़े
आज मखमल से कई
ज़ख्म अपने सिल रहे
जैसे कलयुग की किस्मत ,,,
धृतराष्ट्र कई लिख रहे,,

जैसे कलयुग की किस्मत ,,,
धृतराष्ट्र कई लिख रहे,,

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वृक्ष लगाओ ,,,,धरा बचाओ

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