Thursday, June 21, 2018

आज छल इस मन के समीप से गुजरा है,, कुछ प्रपंच नाम का पँछी इधर से निकला है,, लब निःशब्द है,, हृदयआहत है,, इस मंदिर की मूर्ति को चुराने,, आज कोई बहरूपिया निकला है हैं कई सवाल ख़ुद से,, और कुछ तुमसे भी,, मन के पटल पर कई मोती बिखरे थे,, जो बंधे थे एक सूत्र में कभी,, वो आज अश्कों के रूप में निकले है जैसे कोई अपना ही घर का भेदी बन के निकला है आज छल इस मन के समीप से गुजरा है,, कुछ प्रपंच नाम का पँछी इधर से निकला है,, Nirmal EARTHCARE FOUNDATION NGO www.earthcarengo.org

आज छल इस मन के समीप से गुजरा है,,
कुछ प्रपंच नाम का पँछी इधर से निकला है,,
लब निःशब्द है,,
हृदयआहत है,,
इस मंदिर की मूर्ति को चुराने,,
आज कोई बहरूपिया निकला है
हैं कई सवाल ख़ुद से,,
और कुछ तुमसे भी,,
मन के पटल पर कई मोती बिखरे थे,,
जो बंधे थे एक सूत्र में कभी,,
वो आज अश्कों के रूप में निकले है
जैसे कोई अपना ही घर का भेदी बन के निकला है
आज छल इस मन के समीप से गुजरा है,,
कुछ प्रपंच नाम का पँछी इधर से निकला है,,

Nirmal
EARTHCARE FOUNDATION NGO
www.earthcarengo.org

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