जाने कहाँ,,,गये वो सहनशील साहित्यकार,,,कलाकार,,,
जो अपने मेडल लौटाने के लिए,,,और कुछ लोग अपना देश तक छोड़ने के लिए तैय्यार थे ,,,आज जब हमारे देश पर मर मिटने वाले सैनिको को पत्थर मारते है,,,उनको जान से मारने में आतंकियों की मदद करते है,,,उनके विरोध में कोई अपना तमगा क्यों नही लौटाना चाहता,,,,
क्या यह असहनशीलता नही,,,जब हमारे सामने ही कोई पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है,,,
मेरा बस इतना ही मन करता है,,,
मैं असहिष्णु नही,,,लेकिन,,
उन देशद्रोहियों के रक्त से स्नान जरूर करना चाहता हु ,,,जो हमारे वीर सैनिको की सहनशीलता की हर क्षण परीक्षा लेते है
जय हिंद
जय भारत
निर्मल अवस्थी
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