ऐ वक़्त ठहर जा कुछ पल
कुछ लम्हों को अपनी गोदी में भर लूँ
थक गई हूं इस जिंदगी से
दो पल मैं खुद से बाते कर लूँ
कि जिंदगी है क्या,,
दो पल की मस्ती,,
या इक जुआं,,
जैसे खुद की कंपकपाती हथेली पर
ये बोझ,,,या
मोह माया तृष्णा,,,का बोझ
ये रिश्ते,,,ये नाते सब मृग तृष्णा हो गए
कल जो मेरे अपने थे आज आंखों से ओझल हो गए
शायद वो सपना था मेरी जागती आँखों का
या ये दर्द है मेरे जागने का
हे ईश्वर,,,,
कौन है ऊंच,,और,,कौन नीच,,
कौन है मेरा अपराधी
ये खुद को नही बोध
बस मैं,,, मेरी तन्हाई,,मेरे आँसू मेरे साथ है
इक अनजान सी ,,,अनजाने सफर को
अपने आँसुओ में सफर कर रही हूं
हे ईश्वर
।।।।।।।।।।
Nirmal Awasthi
EARTHCARE FOUNDATION ngo
www.earthcarengo.org
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