Friday, May 18, 2018

मैं का आत्मविश्लेषण अत्यंत ही जटिल है,,क्योकि मैं ही सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड पर असंतोष का कारण है जिस दिन ये हमारे मन मस्तिष्क से बाहर हो जाएगा ,,उसी क्षण इस चराचर जगत में शांति और संतोष का वास होगा,,,आइए हम जानने का प्रयास करते है कि मैं की उपज का कारण क्या है,,मेरा मानना यही है कि जहाँ पर असंतोष,,,दम्भ,,विचारों में अस्थिरता ,,इर्श्या,, कट्टरता होती है वही से मैं,,,हम से अलग होकर उपजता है,,,आखिर मैं क्या है(हम=मैं+मैं) ये सीधी सी परिभाषा है या ये इस सूत्र के आधार पर समझा जा सकता है,,लेकिन इसके दुष्परिणाम अत्यंत ही खतरनाक है,,,क्योकि उसमे हम अकेले पड़ जाते है ,,

मैं का आत्मविश्लेषण अत्यंत ही जटिल है,,क्योकि मैं ही  सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड पर असंतोष का कारण है जिस दिन ये हमारे मन मस्तिष्क से बाहर हो जाएगा ,,उसी क्षण इस चराचर जगत में शांति और संतोष का वास होगा,,,आइए हम जानने का प्रयास करते है कि मैं की उपज का कारण क्या है,,मेरा मानना यही है कि जहाँ पर असंतोष,,,दम्भ,,विचारों में अस्थिरता ,,इर्श्या,, कट्टरता होती है वही से मैं,,,हम से अलग होकर उपजता है,,,आखिर मैं क्या है(हम=मैं+मैं) ये सीधी सी परिभाषा है या ये इस सूत्र के आधार पर समझा जा सकता है,,लेकिन इसके दुष्परिणाम अत्यंत ही खतरनाक है,,,क्योकि उसमे हम अकेले पड़ जाते है ,,

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