Tuesday, April 24, 2018

कृपया जरूर पढ़ें मैं बिस्तर पर से उठा...अचानक छाती में दर्द होने लगा... मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था... मैने... पत्नी को देखकर कहा...काव्या थोडा छाती में रोज से आज ज़्यादा दुख रहा है...डाॅक्टर को बताकर आता हूं. .. हा, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना (मोबाइल में देखते देखते हि काव्या बोली... मैं...ऐकटिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पंहुचा... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...ऐकटिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला धुर्वजी(रामो) सायकल लेकर आया... सायकल को ताला मारते हि उसे मैने मेरे सामने खडा देखा... क्यों साब. ..ऐकटिवा चालू नहीं हो रहा है... मैंने कहा नहीं... आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ? साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके चालू कर देता हूं... धुर्व ने एक ही किक मारकर ऐकटिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा..साब अकेले जा रहे हो ? मैंने कहा... हां ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते... चलिए मेरे पीछे बैठ जाओ... मैंने कहा तुम्हे ऐकटिवा चलाने आता है ? साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता छोड़कर बैठ जाओ... पास ही एक अस्पताल में हम पंहुचे, धुर्व दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया... साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ.. धुर्व के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही... मैं समझ गया था... फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे...कि अब तक क्यों नहीं आया ? धुर्व ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता.... धुर्व डाॅक्टर के जैसे हि व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछै मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया.... डाॅक्टरों की टीम तो तयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर...सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाॅक्टर ने कहा, आप समय पर पहुंच गए हो....इस में भी आप व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा... अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आपके स्वजन की सही की ज़रूरत है... डाॅक्टर धुर्व को सामने देखा... मैंने कहा , बेटे, सही करने आती है ? साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो... बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुम ने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी... एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके लीख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है, धुर्व ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर किये हैं, बस अब. .. और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो... बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल धुर्व के मोबाइल पर आया.....धुर्व, शांति से काव्या को सुनने लगा... थोड़ी देर के बाद धुर्व बोला,मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो , मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पंहुच जाओ. हा मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूं. डोक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है... मैंने कहा, बेटा घर से फोन था...? हा साब. मैं मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो ? आंखों में आंसू के साथ धुर्व के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला,बेटा चिंता नहीं कर... मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है. तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है... बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना. ऑपरेशन बाद, मैं हौश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आंखों में आंसू के साथ बोला, धुर्व कंहां है ? काव्या बोली-: वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा. अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा... हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया ! पूरा परिवार हाथ जोड़कर , मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था... ऐक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था.... डाॅक्टर ने आकर कहा, सब से पहले धुर्व भाई आप के क्या लगते ? मैंने कहा डाॅक्टर साहब, कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बैहत्तर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी. बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो (धुर्व) आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था. पिन्टू बोला : हमको माफ करो पप्पा, जो फर्ज़ हमारा था, वह धुर्व ने पूरी कीया वह हमारे लिए शर्मजनक है, अबसे ऐसी भूल भविष्य में नहीं होगी. .. बेटा,जवाबदारी और नसीहत(सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है... जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे(या बग़ल झाकते है) हो जातें है. अब रही मोबाइल की बात...बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने,जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है, नहीं तो.... परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा. परिवार के सदस्यों को समर्पित

कृपया जरूर पढ़ें

मैं बिस्तर पर से उठा...अचानक छाती में दर्द होने लगा... मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के
कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था...

मैने... पत्नी को देखकर कहा...काव्या थोडा छाती में रोज से आज ज़्यादा दुख रहा है...डाॅक्टर को बताकर आता हूं. ..

हा, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना (मोबाइल में देखते देखते हि काव्या बोली...

मैं...ऐकटिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पंहुचा... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...ऐकटिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला धुर्वजी(रामो) सायकल लेकर आया... सायकल को ताला मारते हि
उसे मैने मेरे सामने खडा देखा...

क्यों साब. ..ऐकटिवा चालू नहीं हो रहा है...

मैंने कहा नहीं...

आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ?
साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके
चालू कर देता हूं... धुर्व ने एक ही किक मारकर ऐकटिवा चालू कर दिया,
साथ ही पूछा..साब अकेले जा रहे हो ?

मैंने कहा... हां

ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते... चलिए मेरे पीछे बैठ जाओ...

मैंने कहा तुम्हे ऐकटिवा चलाने आता है ?

साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता छोड़कर बैठ जाओ...

पास ही एक अस्पताल में हम पंहुचे, धुर्व दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया...

साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ..

धुर्व के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही... मैं समझ गया था...
फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे...कि अब तक क्यों नहीं आया ?
धुर्व ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता....

धुर्व डाॅक्टर के जैसे हि व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछै मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया....

डाॅक्टरों की टीम तो तयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर...सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाॅक्टर ने कहा, आप समय पर पहुंच गए हो....इस में भी
आप व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा...
अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आपके स्वजन की सही की ज़रूरत है...
डाॅक्टर धुर्व को सामने देखा...

मैंने कहा , बेटे, सही करने आती है ?

साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो...

बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुम ने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी...

एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके
लीख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है,
धुर्व ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर किये हैं, बस अब. ..
और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो...

बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल धुर्व के मोबाइल पर आया.....धुर्व, शांति से काव्या को सुनने लगा...

थोड़ी देर के बाद धुर्व बोला,मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो , मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पंहुच जाओ. हा मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूं. डोक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है...

मैंने कहा, बेटा घर से फोन था...?

हा साब.

मैं मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो ?

आंखों में आंसू के साथ धुर्व के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला,बेटा चिंता नहीं कर...

मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं,
वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है.

तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है,
तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है...
बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना.

ऑपरेशन बाद, मैं हौश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आंखों में आंसू के साथ बोला, धुर्व कंहां है ?

काव्या बोली-: वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा.

अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा...

हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया !

पूरा परिवार हाथ जोड़कर , मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था...

ऐक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था....

डाॅक्टर ने आकर कहा, सब से पहले धुर्व भाई आप के क्या लगते ?

मैंने कहा डाॅक्टर साहब, कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बैहत्तर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी. बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो (धुर्व) आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था.

पिन्टू बोला : हमको माफ करो पप्पा, जो फर्ज़ हमारा था, वह धुर्व ने पूरी कीया वह हमारे लिए शर्मजनक है, अबसे ऐसी भूल भविष्य में नहीं होगी. ..

बेटा,जवाबदारी और नसीहत(सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है...
जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे(या बग़ल झाकते है) हो जातें है.

अब रही मोबाइल की बात...बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने,जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है,

नहीं तो....

परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा.

परिवार के सदस्यों को समर्पित

Monday, April 23, 2018

*जिहाद* *सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।* एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं। तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया। आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया। 25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा गुर्जर प्रतिहार उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था। इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला--- *महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।* महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।" *"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"* महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। " तक्षक ने कहा- *"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"* "पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर" "राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।" महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा। आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था.... उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था। विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा- "आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।" *इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।* *तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा।* 🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​ *विनम्र निवेदन* यह पोस्ट आपके 👌​​​👌​​​✌​​​✌​​​👍​​​👍​​​ की मोहताज नही है। भारत के इतिहास की यह गौरवशाली कथा उच्च कोटि की ही है। बस आपसे इतना विनम्र निवेदन है कि पसन्द आये तो forward अवश्य करें 🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​🙏​​

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           *जिहाद*

*सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद  एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।*

एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और  बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।
आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।
                                25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज  के गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा गुर्जर प्रतिहार उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला---
*महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।*

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।"

*"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"*

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले-
"किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। "

तक्षक ने कहा-
*"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"*

"पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर"

"राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।"

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।

अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था....

उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"

*इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।*
*तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा।*
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*विनम्र निवेदन*
यह पोस्ट आपके 👌​​​👌​​​✌​​​✌​​​👍​​​👍​​​ की मोहताज नही है। भारत के इतिहास की यह गौरवशाली कथा उच्च कोटि की ही है।
बस आपसे इतना विनम्र निवेदन है कि
पसन्द आये तो forward अवश्य करें
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Wednesday, April 11, 2018

साहेब रिश्ते हम भी इतने कमज़ोर ना बनाते,,जो दो लम्हो में कोई दिल की किताब से मुझे delete कर दे Nirmal Awasthi

साहेब रिश्ते हम भी इतने कमज़ोर ना बनाते,,जो दो लम्हो में कोई दिल की किताब से मुझे delete कर दे
Nirmal Awasthi

चल तू भी आजमा ले ऐ दुनिया,,,तू फरेब करके दिखा,,मै इनको सहकर दिखाता हूं

चल तू भी आजमा ले ऐ दुनिया,,,तू फरेब करके दिखा,,मै इनको सहकर दिखाता हूं
Nirmal awasthi

Tuesday, April 10, 2018

मन मे दम्भ है,,, पाखंड है,, जल रहा है,, हृदय हर पल,, नयनों में है,,, समुद्र सा जल,,, जीवन है ये चार पल का,,, फिर कैसा घमण्ड है,,, मन मे दम्भ है,,, पाखंड है,, जो भी है ,,, सब छीन लो,,, मार डालो,,, काट डालो,,, ये तो है प्रतिशोध मन का,,, पौधों को जड़ से उखाड़ डालों,, हैं मन मेरा स्तब्ध देखो,, जैसे हर घड़ी निःशब्द है,,, भीष्म ने है ली प्रतिज्ञा,,, इसलिए वो मौन है,,, दुर्योधनों का बोलबाला,, असहायों से छीने निवाला,, अश्रुपूरित मन मेरा,, आज बहुत बेचैन है,,, मन मे दम्भ है,,, पाखंड है,, जल रहा है,, हृदय हर पल,, नयनों में है,,, समुद्र सा जल,,, जीवन है ये चार पल का,,, फिर कैसा घमण्ड है,,, फिर तमस का नाश कर दो,, जीवन मे तुम प्रकाश भर दो चाहे कुछ कर दो,,, नही तो,, महाकाल बनके संघार कर दो,, भष्म कर दो धरा,, इन पापियों इन ढोंगियों से,, काले बनके मेघ सा,, मन के मल का नाश कर दो,,, दे दो हमे जो देना है,, चाहे कोई भी दण्ड हो,, मन मे दम्भ है,,, पाखंड है,, जल रहा है,, हृदय हर पल,, नयनों में है,,, समुद्र सा जल,,, जीवन है ये चार पल का,,, फिर कैसा घमण्ड है,,, Nirmal Awasthi

मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,

जो भी है ,,,
सब छीन लो,,,
मार डालो,,,
काट डालो,,,
ये तो है प्रतिशोध मन का,,,
पौधों को जड़ से उखाड़ डालों,,
हैं मन मेरा स्तब्ध देखो,,
जैसे हर घड़ी निःशब्द है,,,
भीष्म ने है ली प्रतिज्ञा,,,
इसलिए वो मौन है,,,
दुर्योधनों का बोलबाला,,
असहायों से छीने निवाला,,
अश्रुपूरित मन मेरा,,
आज बहुत बेचैन है,,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,
फिर तमस का नाश कर दो,,
जीवन मे तुम प्रकाश भर दो
चाहे कुछ कर दो,,,
नही तो,,
महाकाल बनके संघार कर दो,,
भष्म कर दो धरा,,
इन पापियों इन ढोंगियों से,,
काले बनके मेघ सा,,
मन के मल का नाश कर दो,,,
दे दो हमे जो देना है,,
चाहे कोई भी दण्ड हो,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,

Nirmal Awasthi

Wednesday, April 4, 2018

मेरे सपने ,,मेरी यादों,, में अक्सर मैं अकेला हूँ,, मेरे ख़्वाबों,,मेरी रातों में अक्सर मैं अकेला हूँ पवन संग उड़ जाऊँगा इक दिन मैं नीर संग बह जाऊँगा मैं,,, मन मे दर्द छिपे मेरे ,,चुपचाप सह जाऊंगा मैं,,, है ये आकाश भी तन्हा,, धरा भी है अकेली ही,, है मन का चांद भी तन्हा,, जिसकी रातें सहेली है,,, अपने मन की पहेली को,, तुझसे कह जाऊँगा इक दिन,, मेरी धड़कन तो चलती हैं,, हैं साँसे अब अधूरी तुम बिन,, मेरे सपने ,,मेरी यादों,, में अक्सर मैं अकेला हूँ,, मेरे ख़्वाबों,,मेरी रातों में अक्सर मैं अकेला हूँ पवन संग उड़ जाऊँगा इक दिन मैं नीर संग बह जाऊँगा मैं,,, Nirmal Awasthi www.earthcarengo.org

मेरे सपने ,,मेरी यादों,, में अक्सर मैं अकेला हूँ,,
मेरे ख़्वाबों,,मेरी रातों में अक्सर मैं अकेला हूँ
पवन संग उड़ जाऊँगा इक दिन मैं
नीर संग बह जाऊँगा मैं,,,
मन मे दर्द छिपे मेरे ,,चुपचाप सह जाऊंगा मैं,,,
है ये आकाश भी तन्हा,,
धरा भी है अकेली ही,,
है मन का चांद भी तन्हा,,
जिसकी रातें सहेली है,,,
अपने मन की पहेली को,,
तुझसे कह जाऊँगा इक दिन,,
मेरी धड़कन तो चलती हैं,,
हैं साँसे अब अधूरी तुम बिन,,
मेरे सपने ,,मेरी यादों,, में अक्सर मैं अकेला हूँ,,
मेरे ख़्वाबों,,मेरी रातों में अक्सर मैं अकेला हूँ
पवन संग उड़ जाऊँगा इक दिन मैं
नीर संग बह जाऊँगा मैं,,,

Nirmal Awasthi
www.earthcarengo.org

Tuesday, April 3, 2018

जल रहा हृदय देखो आने वाली प्रलय देखो क्रुद्ध है हर मन जैसे विचारों का दमन देखो,, क्यों नही समझे ये मन कैसा है दीवानापन,, हो गए सब बावले,, अपनो का ही रक्त पीकर,, हो गए मदमस्त देखो,, क्या धरा अब मौन है या है हम सब विवस रिश्ते नाते टूट गए सारे,, अपने भी हो गए पराये,, चाय वाले चाचा हो बिचारे,, राजू भैय्या रेहड़ी वाले,, रास्ते पर वो अबोध बच्चा,, हो गया सब मौन देखो,, हो गया सब मौन देखों,, जल रहा हृदय देखो आने वाली प्रलय देखो क्रुद्ध है हर मन जैसे विचारों का दमन देखो,, कई औरतें हो गयी बेवा बुजर्गों की टूट गयी लाठी,, बेसहारा होकरके,, रोते बेबस वो बिचारे,,, नन्हे वो निश्छल मन जिनका छिन गया तन मन था एक आँचल का सहारा,, आँसुओ में भीगा हुआ आज,, कई जिंदगियों का मन देखो,, जल रहा हृदय देखो आने वाली प्रलय देखो क्रुद्ध है हर मन जैसे विचारों का दमन देखो,,

जल रहा हृदय देखो
आने वाली प्रलय देखो
क्रुद्ध है हर मन जैसे
विचारों का दमन देखो,,
क्यों नही समझे ये मन
कैसा है दीवानापन,,
हो गए सब बावले,,
अपनो का ही रक्त पीकर,,
हो गए मदमस्त देखो,,
क्या धरा अब मौन है
या है हम सब विवस
रिश्ते नाते टूट गए सारे,,
अपने भी हो गए पराये,,
चाय वाले चाचा हो बिचारे,,
राजू भैय्या रेहड़ी वाले,,
रास्ते पर वो अबोध बच्चा,,
हो गया सब मौन देखो,,
हो गया सब मौन देखों,,

जल रहा हृदय देखो
आने वाली प्रलय देखो
क्रुद्ध है हर मन जैसे
विचारों का दमन देखो,,

कई औरतें हो गयी बेवा
बुजर्गों की टूट गयी लाठी,,
बेसहारा होकरके,,
रोते बेबस वो बिचारे,,,
नन्हे वो निश्छल मन
जिनका छिन गया तन मन
था एक आँचल का सहारा,,
आँसुओ में भीगा हुआ आज,,
कई जिंदगियों का मन देखो,,
जल रहा हृदय देखो
आने वाली प्रलय देखो
क्रुद्ध है हर मन जैसे
विचारों का दमन देखो,,

Nirmal Awasthi
www.earthcarengo.org