मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जो भी है ,,,
सब छीन लो,,,
मार डालो,,,
काट डालो,,,
ये तो है प्रतिशोध मन का,,,
पौधों को जड़ से उखाड़ डालों,,
हैं मन मेरा स्तब्ध देखो,,
जैसे हर घड़ी निःशब्द है,,,
भीष्म ने है ली प्रतिज्ञा,,,
इसलिए वो मौन है,,,
दुर्योधनों का बोलबाला,,
असहायों से छीने निवाला,,
अश्रुपूरित मन मेरा,,
आज बहुत बेचैन है,,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,
फिर तमस का नाश कर दो,,
जीवन मे तुम प्रकाश भर दो
चाहे कुछ कर दो,,,
नही तो,,
महाकाल बनके संघार कर दो,,
भष्म कर दो धरा,,
इन पापियों इन ढोंगियों से,,
काले बनके मेघ सा,,
मन के मल का नाश कर दो,,,
दे दो हमे जो देना है,,
चाहे कोई भी दण्ड हो,,
मन मे दम्भ है,,,
पाखंड है,,
जल रहा है,,
हृदय हर पल,,
नयनों में है,,,
समुद्र सा जल,,,
जीवन है ये चार पल का,,,
फिर कैसा घमण्ड है,,,
Nirmal Awasthi
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