प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े अनसुने तथ्य
●Untold Truth Of Plastic Pollution●
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पिछले दिनों सरकार ने 50 माइक्रोन से पतली प्लास्टिक पन्नी पर बैन लगा दिया है जिसको लेकर सरकार पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हुए पूछा जा रहा है कि सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्लास्टिक पैकेजिंग पर अथवा प्लास्टिक के अन्य उत्पादों पर बैन क्यों नही लगाया है। मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े तथ्यों का समग्रता से ज्ञान नही है। प्लास्टिक से जुड़े कुछ अनकहे-अनसुने तथ्य बताती इस पोस्ट को पढिये तथा कृपया अपने मित्रों से साझा करें।
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पिछले 100 वर्षों में हम लगभग 83 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन कर चुके हैं। जिसमें से लगभग 63 अरब टन प्लास्टिक बेकार हो चुका है। अगर इस प्लास्टिक का ढेर बनाया जाये तो इसकी ऊंचाई, चौड़ाई और लंबाई की माप लगभग 2 किलोमीटर (Each Side) होगी।
इस 63 अरब में से 21% प्लास्टिक रीसायकल अथवा नष्ट किया जा चुका है। तो बाकी 79% का क्या किया जाए?
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चूंकि प्लास्टिक सामान्यतः डिग्रेड होने में 1000-500 वर्ष का समय लेता है इसलिए कचरा भंडारों अथवा लैंडफिल्स में इस प्लास्टिक को वर्षों तक सड़ने के लिए छोड़ना जमीन और वक़्त दोनों की बर्बादी है।
तो बेहतर उपाय क्या है?
दुनिया मे कई देश कोयले अथवा नेचुरल गैस की बजाय प्लास्टिक को जला कर प्राप्त ऊष्मा से अपनी बिजली जरूरतें पूरी कर रहे हैं इसलिए प्लास्टिक का सबसे बेहतर उपयोग प्लास्टिक को जलाना ही है। (यहां घर पर प्लास्टिक जलाने की बात नही हो रही है)
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अब आप कहेंगे कि प्लास्टिक को जलाने से हानिकारक कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस भी निकलती है। उसका क्या?
ये सच है कि प्लास्टिक को जलाने से प्रति मेगावाट लगभग 2988 पाउंड CO2 उत्पन्न होती है जो कि कोयले (2249 पाउंड) और नेचुरल गैस (1135 पाउंड) के मुकाबले काफी ज्यादा है।
फिर भी... प्लास्टिक को जलाना बेहतर इसलिए है क्योंकि... प्लास्टिक को जला कर आप वो CO2 मुक्त करते हैं जो पहले से ही वातावरण में मौजूद थी।
पर कोयले को जलाने से आप वो कार्बन मुक्त करते हैं जो करोड़ों वर्षों से जमीन के नीचे बन्द था (इसलिए कोयले को जलाने से हवा में कार्बन की नेट मात्रा बढती है, प्लास्टिक को जलाने से नही)
प्लास्टिक को जलाने से कुछ हानिकारक टॉक्सिन्स भी उत्पन्न होते हैं लेकिन वर्तमान रीसायकल प्लांट उनके शोधन में पूर्णतः सक्षम हैं।
इसके अलावा प्लास्टिक को जलाना इसलिए भी बेहतर है क्योंकि कचरा भंडारों में मौजूद बैक्टीरिया इस प्लास्टिक को डिग्रेड कर एक ऐसी गैस उत्पन्न करते हैं जो कार्बन के मुकाबले 25 गुना पृथ्वी को गर्म करने में सक्षम है।
यस... मीथेन !!!!
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तो हो गया फैसला... जब प्लास्टिक को आराम से जलाया जा सकता है तो प्लास्टिक के नाम पर इतना हंगामा क्यों किया जाता है?
जवाब यह है कि... हमारी आदतें खराब हैं।
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प्लास्टिक के निस्तारण की विधियां मौजूद होने के बावजूद दुनिया के कई देश इस दिशा में कोई कदम नही उठा रहे हैं और अपने प्लास्टिक कचरे को गैरजिम्मेदाराना तरीके से नदियों में प्रवाहित कर देते हैं, जहां यह कचरा जाकर समुद्र में जमा होता जाता है और इस कचरे को खाने के कारण मत्स्य प्रजातियों के अस्तित्व पर गम्भीर संकट खड़े हो गए हैं।
इस प्लास्टिक प्रदूषण के 90% जिम्मेदार भारत और चीन नामक दो राष्ट्र हैं। बढ़ती जनसंख्या के बोझ के बीच हमनें खूबसूरत आशियानें बना लिए, लोगों को बेहतर जीवन मुहैया कराया पर अपने कचरे को निपटाने के तरीकों पर कोई कदम नही उठाया और गैरजिम्मेदारी से अपने कचरे को नदियों में प्रवाहित करते रहे।
और आज हमारी बेवकूफियों की कीमत समुद्री प्रजातियों को जान देकर चुकानी पड़ रही है।
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तो सरकार ने 50 माइक्रोन से पतली पन्नी पर ही बैन क्यों लगाया है?
वो इसलिए क्यूंकि... बेहद पतले प्लास्टिक शीट से प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों का क्षय होता रहता है और वातावरण में तैरते ये प्लास्टिक के कण हमारी साँसों के माध्यम से हमारे शरीर के अंदर जाकर नुकसान पहुंचाते हैं। समुद्र में तैर रही प्लास्टिक से सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के कारण सूक्ष्म कणों का क्षय होता रहता है। कई सर्वेक्षणों के अनुसार समुद्र में इस समय लगभग 51 ट्रिलियन (51 के बाद 12 जीरो) सूक्ष्म प्लास्टिक कण मौजूद हैं। ये कण समुद्री प्रजातियों द्वारा भूलवश खा लिए जातें हैं और चूंकि ये समुद्री प्रजातियां हमारे डिनर प्लेट का हिस्सा भी होती हैं जिस कारण यह प्लास्टिक घूम फिर कर हमारे शरीर मे ही पहुंच रहा है और कैंसर जैसे असाध्य रोगों को जन्म दे रहा है।
कई सर्वेक्षणों में 93% लोगों के मूत्र सैंपल में प्लास्टिक के कण पाए गए हैं।
इससे भयावह स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल है।
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तो प्लास्टिक पर पूरी तरह बैन लगा दिया जाए?
हम्म.. देखा जाए तो यह भी मूर्खता ही होगी। हमारे पास प्लास्टिक से बेहतर और सस्ता विकल्प फिलहाल मौजूद नही है।
एक कॉटन के बैग को बनाने की प्रक्रिया में हुआ प्रदूषण एक प्लास्टिक बैग के मुकाबले 7000 गुना ज्यादा होता है।
इसके अलावा हमें याद रखना होगा कि दुनिया की आधी आबादी आज भी पैकेजिंग फ़ूड पर पलती है। प्लास्टिक के अतिरिक्त कोई विकल्प नही है जो लंबे समय तक भोजन को सड़ने से बचा कर जीवाणुमुक्त रख पाए।
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प्लास्टिक को समस्या समझने की बजाय बेहतर शोधों और प्लास्टिक के निस्तारण पर ध्यान देने की जरूरत है।
और उससे भी जरूरी है अपनी आदतों को सुधारना
क्योंकि.. इतिहास गवाह है कि विज्ञान और तकनीक इंसान का विनाश नही करती।
हमारा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और आदतें ही पृथ्वी की समस्त समस्याओं का मूल हैं।
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It's Time To Behave Like A Smart Ape !!!
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And As Always
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#झकझकिया
Saturday, July 28, 2018
प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े अनसुने तथ्य
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