आज मैंने हिचकी फ़िल्म देखी,,जैसे जैसे फ़िल्म बढ़ती गयी दिल को छूती गयी काफी संवेदनशील दो पड़ावों से गुजरा ,,एक तो अगर किसी को कोई बीमारी होती है जैसे इस फ़िल्म में अध्यापक को हकलाने की बीमारी है ,,,उसकी वजह से हर मोड़ पर उसको अपमानित होना पड़ता है,,हमारा ये पढा लिखा,,और सूट बूट वाला समाज हमेशा उसको घ्रणित नजरों से देखता है,,हमेशा उसकी खिल्ली उड़ाता है,,मजाक बनाता हैं,,,ये तनिक भी नही सोचता कि उसके इन मजाकों का प्रभाव उसके हृदय पर क्या पड़ेगा,,इन सबकी वजह से वो शारिरिक के साथ साथ मानशिक रूप से भी टूट जाता है,,बहुत ही मुश्किल होता है समाज की इस घ्रणित मानशिकता से लड़ना,,,कभी कभी उसमे रोगी टूट सा जाता है,,कभी कभी रोते हुए भी मुश्कराना पड़ता है,,इस दर्द के पड़ाव को पार करना बहुत ही मुश्किल होता है
दूसरी तरफ़ वो झुग्गी झोपड़ी के बच्चे जो हर सुख सुविधा से मरहूम रहते है ,,उनको अपना बचपन बेचकर अपनी जिंदगी का निर्वाह करना होता है,,
अपने सपनो को शीशों की तरह बिखेरकर,, दूसरों की मंजिलों का कारवां बनाना होता है ,,जो मानशिक और शारिरिक रूप से कमजोर होते है ,,उनको भी हमारा पढा लिखा समाज उन्हें कदम कदम पर अपमानित करता है,,धोखा देता है,,तरह तरह के छलावे करता है,,उसको हर पल ये डर रहता है कि कही ये हमसे आगे ना निकल जाए,,
पर ऐसा क्यों करते है हम?????????
Nirmal Earthcarefoundation Vriksharopan Ekabhiyaan
EARTHCARE FOUNDATION NGO
www.earthcarengo.org
No comments:
Post a Comment