मजदूर आज मजबूर है,,
ख़ुद की अहमियत से दूर है,,
ज़िन्दगी बीत जाती है दो जून की रोटी कमाने में,,
इसलिए वो सपनों से दूर है,,
नेता,,अभिनेता हमारा करते इस्तेमाल है,,
वोट की राजनीति में खुद होते मालामाल है,,
क्या शिक्षा,,क्या रोजगार,,
हम पर होता प्रतिपल अत्याचार,,
हमारी ज़िंदगी,, बिखरे शीशे की तरह,,चूर,,चूर है
मजदूर आज मजबूर है,,
ख़ुद की अहमियत से दूर है,,
Nirmal Earthcarefoundation Vriksharopan Ekabhiyaan
EARTHCARE FOUNDATION NGO
www.earthcarengo.org
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