आजकल कई घटनाएं हमारे सामने घटित होती हैं,,,जिनमे हमारी भूमिका,,महाभारत काल में पितामह भीष्म,,,गुरु द्रोणाचार्य,,और भी महान व्यक्ति जो द्रोपदी चीरहरण में सम्मिलित थे उन जैसी है,,,,वो भी अपनी मजबूरियों में बंधे होने के कारण एक नारी की अस्मिता को बचाने में असमर्थ साबित हुए,,,और हम भी धृतराष्ट्र की तरह आँखे होते हुए भी अंधे होने का ढोंग करते है
चाहे किसी बहन की इज्जत का सवाल हो,,
या किसी गरीब के हक़ की बात हो,,,
या किसी का बचपन बिक रहा हो,,,
या कोई किसी मजबूर की मजबूरियों से खेल रहा हो,,,
और अत्यंत ही दुःख की बात ये है कि हम धर्म के ठेकेदार तो बन जाते है,,,लेकिन उससे कोई सीख नही लेते,,,जिसमे सर्वप्रथम ये बात अंकित होती है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म,,,,नाकि ,,,हिन्दू ,,,मुस्लिम,,
दुःखद मन की व्यथा
निर्मल अवस्थी
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