आजकल किसीको दोषी ठहराना या कमी निकालना बहुत आसान है,ये आज की प्रधानताहै,आज हम जितने अनैतिक और झूठे होंगे उतना ही सम्मानित कहलातेहै
Saturday, September 30, 2017
Friday, September 29, 2017
तेरी केशुओं की उलझन में कुछ उलझे हुए है हम, चल आंखों के इशारों से कुछ बाते ही हो जाये Nirmal Earthcarefoundation Ngo
तेरी केशुओं की उलझन में कुछ उलझे हुए है हम,
चल आंखों के इशारों से कुछ बाते ही हो जाये
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तारों की खोज में निकल पड़े है प्राणी, नींद ना आई तो दिवास्वप्न ही देख लेंगे Nirmal Earthcarefoundation Ngo
तारों की खोज में निकल पड़े है प्राणी,
नींद ना आई तो दिवास्वप्न ही देख लेंगे
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बचपन गुज़र गया तारों की छांव में,,अब तो खुद के लिए भी वक़्त नही ख़ुद से Nirmal Earthcarefoundation Ngo
बचपन गुज़र गया तारों की छांव में,,अब तो खुद के लिए भी वक़्त नही ख़ुद से
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बहुत बड़ी शख़्सियत बन गए हो,बाबूजी हम देखते रह जाते है इकटक,,आप नजर चुरा के निकल जाते हो
बहुत बड़ी शख़्सियत बन गए हो,बाबूजी
हम देखते रह जाते है इकटक,,आप नजर चुरा के निकल जाते हो
उस चाँद की क्या तारीफ़ करूँ, जो हमेशा ग्रहण बन कर ग्रसित किया है हमे Nirmal Earthcarefoundation Ngo
उस चाँद की क्या तारीफ़ करूँ, जो हमेशा ग्रहण बन कर ग्रसित किया है हमे
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Thursday, September 28, 2017
रात की करवटों तले,चाँद की रोशनी में नहाकर, मेरी हंथेली में तेरा नाम रहता है Nirmal Earthcarefoundation Ngo
रात की करवटों तले,चाँद की रोशनी में नहाकर,
मेरी हंथेली में तेरा नाम रहता है
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Wednesday, September 27, 2017
हम अपनी बेटियों को शाम ढलने के बाद निकलने को इसीलिए मना करते है क्योंकि हम सुरक्षित समाज का निर्माण आजतक कर ही नही सके Nirmal
हम अपनी बेटियों को शाम ढलने के बाद निकलने को इसीलिए मना करते है
क्योंकि हम सुरक्षित समाज का निर्माण आजतक कर ही नही पाए ,,,नही तो दिन तो क्या रात में भी हमारी बहने और बेटियां सुरक्षित होती एक पंछी की तरह चाहे जहां उड़ने को,,,नाकि बन्द दरवाजे में कैद रहने को विवश होती
विचार कीजिये कि हम कहाँ है
Nirmal
ANY COMPANY TRY TO HIDE QUALITY OF PRODUCT THEN THIS WILL AUTOMATICALLY ERASED BY MARKET Nirmal Earthcarefoundation Ngo
ANY COMPANY TRY TO HIDE QUALITY OF PRODUCT THEN THIS WILL AUTOMATICALLY ERASED BY MARKET
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एक कहानी,,,मेरी,,,भी,,,
ना जाने ये प्रथा है या कुप्रथा,,,या मानशिकता का कौन सा रूप है,,,जो मेरे मन को कदम दर कदम छलता रहता है,,,,अगर मेरा होना इतना ही बड़ा अभिशाप है,,तो हे ईश्वर मुझे इस धरा पर क्यों भेजा,,, या ,,,क्यूँ इस योनि में जन्म दिया,,,सच मे मैं जानती हूँ कि आज के समाज या जमाने के लिए एक अभिशाप से बढ़कर और कुछ नही हूँ,,,
हर बार मुझे ही क्यों परीक्षा से गुजरना पड़ता है,,,चाहे वो मुझसे संबंधित हो या ना हो,,,,,
क्या मेरा लड़की होना ही मेरी सज़ा है,,,
या मेरी शारीरिक कुरूपता ,,,जिसकी वजह से मुझे कोई नही स्वीकारता,,,मैं घृणित हूँ,,,,और सब घ्रणा करते है मुझसे,,,
क्या मैं भी किसी के सपने देखने का अधिकार रखती हूँ
जब किसी लड़की की शादी की बात चलती है तो उसकी इच्छा कोई नही पूछता,,,बस वो एक पुतले की तरह सजा सवार के बैठा दी जाती है,,उसकी इच्छा ,,,अनिच्छा के बारे में कोई नही पूछता ,,,बस सब लड़के की हाँ का इंतज़ार करते है,,,,ये कैसा समाज है
ये कैसा समान अधिकार है जो सिर्फ पुरूषों को मिला है,,,या पुरुषों के लिए बना है,,,
वो कितनी बार ठुकराई जाती है
,,कितनी बार धिक्कारी जाती है,,,
जिसमे उसका या मेरा कोई दोष नही है
फिर मन हार कर बैठ जाता है
सपने भी इन आँखों से ओझल होने लगते है,,,
जीवन आशा बुझने लगती है,,,,बस अंधकार और,,,अकेलेपन के काले नाग डसने के लिए तैयार हो जाते है
और मैं मूकदर्शक सी हर सुबह,,,,हर शाम
हर दिन ,,,हर रात,,,
हर पल बस ठगी जाती हूँ
बस छली जाती हूँ
Nirmal earthcarefoundation ngo
एक कहानी मेरी भी,,,,,,,
ना जाने ये प्रथा है या कुप्रथा,,,या मानशिकता का कौन सा रूप है,,,जो मेरे मन को कदम दर कदम छलता रहता है,,,,अगर मेरा होना इतना ही बड़ा अभिशाप है,,तो हे ईश्वर मुझे इस धरा पर क्यों भेजा,,, या ,,,क्यूँ इस योनि में जन्म दिया,,,सच मे मैं जानती हूँ कि आज के समाज या जमाने के लिए एक अभिशाप से बढ़कर और कुछ नही हूँ,,,
हर बार मुझे ही क्यों परीक्षा से गुजरना पड़ता है,,,चाहे वो मुझसे संबंधित हो या ना हो,,,
क्या मेरा लड़की होना ही मेरी सज़ा है,,,
या मेरी शारीरिक कुरूपता ,,,जिसकी वजह से मुझे कोई नही स्वीकारता,,,मैं घृणित हूँ,,,,और सब घ्रणा करते है मुझसे,,,
क्या मैं भी किसी के सपने देखने का अधिकार रखती हूँ
जब किसी लड़की की शादी की बात चलती है तो उसकी इच्छा कोई नही पूछता,,,बस वो एक पुतले की तरह सजा सवार के बैठा दी जाती है,,उसकी इच्छा ,,,अनिच्छा के बारे में कोई नही पूछता ,,,बस सब लड़के की हाँ का इंतज़ार करते है,,,,ये कैसा समाज है
ये कैसा समान अधिकार है जो सिर्फ पुरूषों को मिला है,,,या पुरुषों के लिए बना है,,,
वो कितनी बार ठुकराई जाती है
,,कितनी बार धिक्कारी जाती है,,,
जिसमे उसका या मेरा कोई दोष नही है
फिर मन हार कर बैठ जाता है
सपने भी इन आँखों से ओझल होने लगते है,,,
जीवन आशा बुझने लगती है,,,,बस अंधकार और,,,अकेलेपन के काले नाग डसने के लिए तैयार हो जाते है
और मैं मूकदर्शक सी हर सुबह,,,,हर शाम
हर दिन ,,,हर रात,,,
हर पल बस ठगी जाती हूँ
बस छली जाती हूँ
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Sunday, September 10, 2017
तेरी नज़रो ने जालिम काफ़िर बना दिया,, नही तो मैं भी मुसाफ़िर था कभी मुहब्बत की गलियों का Nirmal earthcarefoundation ngo
तेरी नज़रो ने जालिम काफ़िर बना दिया,, नही तो मैं भी मुसाफ़िर था कभी मुहब्बत की गलियों का
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हम हज़ारों लाशों के ढेर पर हो तो क्या मात्र हमारी इबादत या प्रार्थना हमारे किये पापों को धो सकती है Nirmal Earthcarefoundation Ngo
हम हज़ारों लाशों के ढेर पर हो तो क्या मात्र हमारी इबादत या प्रार्थना हमारे किये पापों को धो सकती है
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Friday, September 8, 2017
वाह री जिंदगी,,जिंदा रिश्तों की तीजोरी ताबूतों में दबा रखी है,और मृत आत्माओं के पीछे हम क्यों भटक रहे Nirmal earthcarefoundation
वाह री जिंदगी,,जिंदा रिश्तों की तीजोरी ताबूतों में दबा रखी है,और मृत आत्माओं के पीछे हम क्यों भटक रहे
Nirmal earthcarefoundation
मेरा हर कदम विनाश की ओर,,,,
जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर कदम है विनाश की ओर,,,,
इन हरे भरे पेड़ों में क्या रखा है,,,
मैंने कंक्रीट के महलों को सजा रखा है,,
क्या फर्क पड़ता है देश के कई सूबों में पड़ा है सूखा,,
मेरे यहां हैं नदियों की कतारे,, इसलिए
गलियों में शावर को लगा रखा है
झरने बहते है लाइट के फव्वारों में
सूरज की रौशनी को देखने का समय नही है
इसलिए घर के led बल्ब को जला रखा है
अब हमें मॉडर्न दिखना है,,
गोरों की ड्रेस पहनकर हमे
गोरो की तरह दिखना है
मॉम डैड तो बुजुर्ग है,,वो तो चिल्लाते ही रहते है
इसीलिए व्हाट्सअप और fb से रिश्ता बना बैठे है
कभी कभी मन क्रुद्ध होता,,,जाने कैसा गूंजे ये शोर
जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर कदम है विनाश की ओर,,,,
हर तरफ निराशा है,,,हर कोई अपनों के खून का प्यासा है
ना रिश्तों की अहमियत है
ना ही कोई मर्यादा
हर कोई लड़ रहा आपस
न संयम,,, नाही कोई नियम
चारों तरफ छायी है अँधेरी घटाए घनघोर
जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर कदम है विनाश की ओर,,,,
Thursday, September 7, 2017
सुविधा,,आधुनिकता,,,सुंदरता,,
आजकल सुविधा,,आधुनिकता,,और सुंदरता इन शब्दों ने हमे इस क़दर आशक्त कर दिया है,,,या इस तरह इन्होंने हमारे मन - मष्तिष्क पर कब्जा कर लिया है,,जिनके लिए हम स्वयं को नष्ट करने पर तुले हैं वो भी कैसी सुंदरता,,आधुनिकता,या,,कुछ और सब का सब कृत्रिम,,,मतलब अपनी सुविधाओं के लिए
हम किसी वृक्ष का जीवन नष्ट कर देते है जिसे बड़ा होने में हमारी तरह ही कई वर्ष लगते है,,,जो ना जाने कितने हम जैसे दिग्भ्रमित मनुष्यों का पालन पोषण करता है,,,अपनी प्राणदायी वायु को हमारे अंदर समाहित कराके,,
अपने फलों से,,,पत्तों से,,तने से या पूरे के पूरे शरीर से हमारी निस्वार्थ सेवा करता है,,
हमे औषधियों के रूप में हमारे शरीर के रोगों को दूर से दूर करता है
कड़ी धूप में चलते चलते जब थक जाते है तो यही वृक्ष की छाव जैसे कुछ ही पलों में जीवन दे जाती है,,
पानी की बात करे तो हज़ारों लीटर पानी को पानी की तरह लोग बहाने से नही हिचकते वही पानी जिसके बिना मनुष्य का इक पल भी जीवन संभव नही,,,और अगर हमसे ये पुछा जाए की आज तक अन्न या जल की कितनी बूँदे संरक्षित की है,,,तो हम बहुत ही मजाकिया लहजे में कह देते है अरे बेवकूफ हो क्या यहां कौन सी पानी की कमी है,,,जाओ जाओ अपना भाषण कही और दो जाकर,,,
सुंदरता में तो इतना आशक्त है कि चाहे सिर्फ अपना,,,या ,,अपनी चीज को सुन्दर बनाने या कहने के लिए हम पागल हो जाते है,,,लेकिन फिर कुरूपता को कौन स्वीकारेगा,,,आखिर कभी हमने अपने मन में झाँका है,,,अगर मन कुरूप है तो क्या मन बदल सकते है,,
आत्मा कुरूप है तो क्या आत्मा बदल सकते है
रिश्तों में कुरूपता हो,,या,,,हमारे अपने यार दोस्त,,कुरूप हो तो चुनाव हम सिर्फ गोरी चमड़ी को ही करेंगे,,,काली चमड़ी को नही
ये हमारा अतिविस्वास या किसी भी चीज़ के लिए अतिआश्क्तता कह सकते है,,जिसके मोह जाल में इस तरह ग्रस्त हैं कि उससे हम निकलना ही नही चाहते,,,
अब बात आधुनिकता की जहाँ हम ऐसे आधुनिक युग में प्रवेश कर चुके है जहाँ प्रकृति की सुंदरता से अधिक कंक्रीट के महल लगते हैं
हम इतने आधुनिक हो गए है कि जिस मिटटी में हम पले बढ़े है या जिसने हमारा पालन पोषण किया अब उसकी खुसबू को लोग व्यर्थ,,,और जीवनदायी हवा को प्रदूषित ,,,,और एयर कंडीशनर की हवा को स्वच्छ,,,खुशबूदार,,, बैक्टीरिया रहित,,और ना जाने कितनी खूबियां बताते है
हमारा खान पान भी इतना आधुनिक हो गया कि अब बाबा दादा वाली,,पुरानी दाल रोटी बकवास और,,,चाउमीन,,,पिज्ज़ा,,, बर्गर में हमे ढेरों nutient या पोषक तत्व नज़र आने लगे,,
अब मैं आप को नही कहूंगा नही आप बुरा मान जाओगे मैं स्वयं ही विचार करने की कोशिश करता हु की जिंदगी के कौन से मोड़ पर मैं खड़ा हूँ
विनाश,,,या,,,विकास,,,
Nirmal earthcarefoundation ngo
Friday, September 1, 2017
वेद की आज्ञाओं के उलंघन का कितना भयंकर परिणाम हो सकता है ?* भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओं का उलंघन ही था ।
🔶 *जानिए वेद की आज्ञाओं के उलंघन का कितना भयंकर परिणाम हो सकता है ?* भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओं का उलंघन ही था ।
🍁💎🍁
🔶 *पहली आज्ञा :*
🔸 अक्षैर्मा दिव्य: (ऋ 10/34/13)
🔹 अर्थात् "जुआ मत खेलो ।" इस आज्ञा का उलंघन हुआ । इस आज्ञा का उलंघन धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्टर ने किया ।
🔷 परिणाम : एक स्त्री का भरी सभा में अपमान । महाभारत जैसा भयंकर युद्ध जिसमें लाखों, करोड़ों योद्धा और हज़ारों विद्वान मारे गए । आर्यवर्त पतन की ओर अग्रसर हुआ ।
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🔶 *दूसरी आज्ञा :*
🔸 मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः (ऋ 8/48/14)
🔹 अर्थात् "आलस्य, प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करें ।" लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । महाभारत के कुछ समय बाद भारत के राजा आलस्य प्रमाद में डूब गये ।
🔷 परिणाम : विदेशियों के आक्रमण ।धर्म के नाम पर अंधविश्वास का पाखण्ङ फैल जाना।
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🔶 *तीसरी आज्ञा :*
🔸 सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम (ऋ 10/191/2)
🔹 अर्थात् "मिलकर चलो और मिलकर बोलो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब विदेशियों के आक्रमण हुए तो देश के राजा मिलकर नहीं चले । बल्कि कुछ ने आक्रमणकारियों का ही सहयोग किया ।
🔷 परिणाम : लाखों लोगों का कत्ल, लाखों स्त्रियों के साथ दुराचार, अपार धन-धान्य की लूटपाट, गुलामी ।
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🔶 *चौथी आज्ञा :*
🔸 कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः (अथर्व 7/50/8)
🔹 अर्थात् "मेरे दाएं हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ । लोगों ने कर्म को छोड़कर ग्रहों फलित ज्योतिष आदि पर आश्रय पाया ।
🔷 परिणाम : कर्महीनता, भाग्य के भरोसे रहकर आक्रान्ताओं को मुँहतोड़ जवाब न देना । धन-धान्य का अपव्यय, मनोबल की कमी और मानसिक दरिद्रता ।
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🔶 *पाँचवीं आज्ञा :*
🔸 उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।।
(अथर्व 11/10/1)
🔹 अर्थात् "हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झण्डे को लेकर उठ खड़े हो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषो ! अपने शत्रुओं पर धावा बोल दो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब लोगों के बीच बुद्ध ओर जैन मत के मिथ्या अहिंसावाद का प्रचार हुआ । लोग आक्रमणकारियों को मुँहतोड़ जवाब देने की बजाय मिथ्या अहिंसावाद को मुख्य मानने लगे ।
🔷 परिणाम : अशोक जैसे महान योद्धा का युद्ध न लड़ना । विदेशियों के द्वारा इसका फायदा उठाकर भारत पर आक्रमण ।
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🔶 *छठी आज्ञा :*
🔸 मिथो विघ्राना उप यन्तु मृत्युम (अथर्व 6/32/3)
🔹 अर्थात् "परस्पर लड़ने वाले मृत्यु का ग्रास बनते हैं और नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ ।
🔷 परिणाम : भारत के योद्धा आपस में ही लड़-लड़कर मर गये और विदेशियों ने इसका फायदा उठाया ।
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🔶 *सातवीं आज्ञा :*
🔸 न तस्य प्रतिमा अस्ति
(यजुर्वेद 32/3)
🔹 अर्थात् "ईश्वर का कोई प्रतिमा नहीं है ।" लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ और लोगों ने ईश्वर को एकदेशी मुर्ति तक समेट दिया।
🔷 परिणाम : ईश्वर के सत्य स्वरुप को छोड़कर भिन्न स्वरुप की उपासना और सत्य धर्म को भूला देना। मंदिर मे ढेर सारा धन आदि जमा हो जाना जो न धर्म रक्षा मे लगता है न अभाव गरीबी दुर करने मे।
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☀ तो आइये, फिर से वेदों की ओर लौट चलें . . .
और एक सशक्त राष्ट्र और चरित्रवान विश्व का निर्माण करे
*कृण्वन्तो विश्वमार्यम्*