Thursday, September 7, 2017

सुविधा,,आधुनिकता,,,सुंदरता,,

आजकल सुविधा,,आधुनिकता,,और सुंदरता इन शब्दों ने हमे इस क़दर आशक्त कर दिया है,,,या इस तरह इन्होंने हमारे मन - मष्तिष्क पर कब्जा कर लिया है,,जिनके लिए हम स्वयं को नष्ट करने पर तुले हैं वो भी कैसी सुंदरता,,आधुनिकता,या,,कुछ और सब का सब कृत्रिम,,,मतलब अपनी सुविधाओं के लिए
हम किसी वृक्ष का जीवन नष्ट कर देते है जिसे बड़ा होने में हमारी तरह ही कई वर्ष लगते है,,,जो ना जाने कितने हम जैसे दिग्भ्रमित मनुष्यों का पालन पोषण करता है,,,अपनी प्राणदायी वायु को हमारे अंदर समाहित कराके,,
अपने फलों से,,,पत्तों से,,तने से या पूरे के पूरे शरीर से हमारी निस्वार्थ सेवा करता है,,
हमे औषधियों के रूप में हमारे शरीर के रोगों को दूर से दूर करता है
कड़ी धूप में चलते चलते जब थक जाते है तो यही वृक्ष की छाव जैसे कुछ ही पलों में जीवन दे जाती है,,

पानी की बात करे तो हज़ारों लीटर पानी को पानी की तरह लोग बहाने से नही हिचकते वही पानी जिसके बिना मनुष्य का इक पल भी जीवन संभव नही,,,और अगर हमसे ये पुछा जाए की आज तक अन्न या जल की कितनी बूँदे संरक्षित की है,,,तो हम बहुत ही मजाकिया लहजे में कह देते है अरे बेवकूफ हो क्या यहां कौन सी पानी की कमी है,,,जाओ जाओ अपना भाषण कही और दो जाकर,,,

सुंदरता में तो इतना आशक्त है कि चाहे सिर्फ अपना,,,या ,,अपनी चीज को सुन्दर बनाने या कहने के लिए हम पागल हो जाते है,,,लेकिन फिर कुरूपता को कौन स्वीकारेगा,,,आखिर कभी हमने अपने मन में झाँका है,,,अगर मन कुरूप है तो क्या मन बदल सकते है,,
आत्मा कुरूप है तो क्या आत्मा बदल सकते है
रिश्तों में कुरूपता हो,,या,,,हमारे अपने यार दोस्त,,कुरूप हो तो चुनाव हम सिर्फ गोरी चमड़ी को ही करेंगे,,,काली चमड़ी को नही
ये हमारा अतिविस्वास या किसी भी चीज़ के लिए अतिआश्क्तता कह सकते है,,जिसके मोह जाल में इस तरह ग्रस्त हैं कि उससे हम निकलना ही नही चाहते,,,

अब बात आधुनिकता की जहाँ हम ऐसे आधुनिक युग में प्रवेश कर चुके है जहाँ प्रकृति की सुंदरता से अधिक कंक्रीट के महल लगते हैं
हम इतने आधुनिक हो गए है कि जिस मिटटी में हम पले बढ़े है या जिसने हमारा पालन पोषण किया अब उसकी खुसबू को लोग व्यर्थ,,,और जीवनदायी हवा को प्रदूषित ,,,,और एयर कंडीशनर की हवा को स्वच्छ,,,खुशबूदार,,, बैक्टीरिया रहित,,और ना जाने कितनी खूबियां बताते है
हमारा खान पान भी इतना आधुनिक हो गया कि अब बाबा दादा वाली,,पुरानी दाल रोटी बकवास और,,,चाउमीन,,,पिज्ज़ा,,, बर्गर में हमे ढेरों nutient या पोषक तत्व नज़र आने लगे,,

अब मैं आप को नही कहूंगा नही आप बुरा मान जाओगे मैं स्वयं ही विचार करने की कोशिश करता हु की जिंदगी के कौन से मोड़ पर मैं खड़ा हूँ
विनाश,,,या,,,विकास,,,

Nirmal earthcarefoundation ngo

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