Wednesday, September 27, 2017

एक कहानी,,,मेरी,,,भी,,,

ना जाने ये प्रथा है या कुप्रथा,,,या मानशिकता का कौन सा रूप है,,,जो मेरे मन को कदम दर कदम छलता रहता है,,,,अगर मेरा होना इतना ही बड़ा अभिशाप है,,तो हे ईश्वर मुझे इस धरा पर क्यों भेजा,,, या ,,,क्यूँ इस योनि में जन्म दिया,,,सच मे मैं जानती हूँ कि आज के समाज या जमाने के लिए एक अभिशाप से बढ़कर और कुछ नही हूँ,,,
हर बार मुझे ही क्यों परीक्षा से गुजरना पड़ता है,,,चाहे वो मुझसे संबंधित हो या ना हो,,,,,
क्या मेरा लड़की होना ही मेरी सज़ा है,,,
या मेरी शारीरिक कुरूपता ,,,जिसकी वजह से मुझे कोई नही स्वीकारता,,,मैं घृणित हूँ,,,,और सब घ्रणा करते है मुझसे,,,
क्या मैं भी किसी के सपने देखने का अधिकार रखती हूँ
जब किसी लड़की की शादी की बात चलती है तो उसकी इच्छा कोई नही पूछता,,,बस वो एक पुतले की तरह सजा सवार के बैठा दी जाती है,,उसकी इच्छा ,,,अनिच्छा के बारे में कोई नही पूछता ,,,बस सब लड़के की हाँ का इंतज़ार करते है,,,,ये कैसा समाज है
ये कैसा समान अधिकार है जो सिर्फ पुरूषों को मिला है,,,या पुरुषों के लिए बना है,,,
वो कितनी बार ठुकराई जाती है
,,कितनी बार धिक्कारी जाती है,,,
जिसमे उसका या मेरा कोई दोष नही है
फिर मन हार कर बैठ जाता है
सपने भी इन आँखों से ओझल होने लगते है,,,
जीवन आशा बुझने लगती है,,,,बस अंधकार और,,,अकेलेपन के काले नाग डसने के लिए तैयार हो जाते है
और मैं मूकदर्शक सी हर सुबह,,,,हर शाम
हर दिन ,,,हर रात,,,
हर  पल बस ठगी जाती हूँ
बस छली जाती हूँ

Nirmal earthcarefoundation ngo

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