Friday, September 8, 2017

मेरा हर कदम विनाश की ओर,,,,

जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर  कदम है विनाश की ओर,,,,
इन हरे भरे पेड़ों में क्या रखा है,,,
मैंने कंक्रीट के महलों को सजा रखा है,,
क्या फर्क पड़ता है देश के कई सूबों में पड़ा है सूखा,,
मेरे यहां हैं नदियों की कतारे,, इसलिए
गलियों में शावर को लगा रखा है
झरने बहते है लाइट के फव्वारों में
सूरज की रौशनी को देखने का समय नही है
इसलिए घर के led बल्ब को जला रखा है
अब हमें मॉडर्न दिखना है,,
गोरों की ड्रेस पहनकर हमे
गोरो की तरह दिखना है
मॉम डैड तो बुजुर्ग है,,वो तो चिल्लाते ही रहते है
इसीलिए व्हाट्सअप और fb से रिश्ता बना बैठे है
कभी कभी मन क्रुद्ध होता,,,जाने कैसा गूंजे ये शोर

जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर  कदम है विनाश की ओर,,,,
हर तरफ निराशा है,,,हर कोई अपनों के खून का प्यासा है
ना रिश्तों की अहमियत है
ना ही कोई मर्यादा
हर कोई लड़ रहा आपस
न संयम,,, नाही कोई नियम
चारों तरफ छायी है अँधेरी घटाए घनघोर

जाने क्यों मन चला है आज आकाश की ओर,,,
जो,मेरा हर  कदम है विनाश की ओर,,,,

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