छल कई बार किया है,,लोगो ने मिलकर मुझसे,,
कभी मेरे विचारों से,,,
कभी मेरी बातों से,,,
कभी मेरी बोली से,,
कभी मेरे पहनावे से,,,
अपमानित कई बार किया है,,लोगो ने मिलकर मुझसे,,,
कभी मेरी जाति धर्म को लेकर,,,
कभी मेरे गाँव,,,प्रदेश को लेकर,,,
कभी मेरे अज्ञान,,को लेकर,,,
कभी खुद के अभिमान ,,,को लेकर,,
मुझपर आघात कई बार,,,किया है,,,,लोगो ने मिलकर मुझको,,,
कभी मेरे ह्रदय को आहत करके,,,
कभी मेरे विस्वास को तोड़कर,,,,
कभी मुझसे मुह मोड़कर,,,
पर फिर भी ये ह्रदय विचलित है,,,
मन स्तब्ध है,,,
गला रुंधा हुआ है,,,
और,,
नयन विक्षिप्त है,,,
इसलिए,,,
स्नेह कई बार किया है,,
हर बार सबसे प्यार किया है,,,
बस एक आस के साथ,,,
एक विस्वास के साथ,,,
कभी तो मिटेंगी ये दूरी,,,
निर्मल अवस्थी
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