जाने क्या है मन में मेरे,,,
जो जान के तुम ना समझ पाए,,,
अपने ही एहसासों में मैं,,,
तिनका तिनका सा बिखरा हु,,,
है प्रचंड ज्वाला में मैं दहक रहा,,,
विचलित होता जीवन ,,,या,,,मैं,,
और खण्ड खण्ड होता ये ह्रदय,,,,,
ना अखण्ड ये रहा राष्ट्र,,,
अब खण्डित इसकी परिभाषा,,
मैं अपने आप में हु खण्डित,,
परिवारों में नही समानता,,,
है जाति,, धर्म का बोलबाला यहाँ,,
आज रो रही भारत माता,,,
विच्छिन्न हुआ है तन मन ये,,
और खण्ड खण्ड होता ये ह्रदय,,,,,
कोई कहे कि हम है,,हिन्दू
कोई कहे हम है मुसलमान,,,
कोई कहे की हम है मलयाली,,
कोई कहे की मेरी मराठी बोली,,,
कोई यहां यू पी वाला,,
है कोई यहाँ पर हरियाणी,,
पर एक अरब की जनता में ,,
कुछ ही कहते ,,,हम भारतवासी,,
इसलिए इस पावन धरती को,,
तिल तिल, कर हमने जख्म दिए,,
ये दशा देखकर,,है खून के आंसू खुद ही पिए,,
और खण्ड खण्ड होता ये ह्रदय,,,,,
नेताओ का ये नैतिक पतन,,,
कुर्सी के लिए करे सारे जतन,,,
न शब्दों की कोई सीमा है,,,,
बस पैसे ही ईमान धर्म,,,
ना संसद की कोई गरिमा है,,,
बस अपने हित को ये जाने,,,
इस संविधान के मंदिर में,,
सहीदो के सपनो को क्षीण किया,,,
ना देश की चिंता मन में है,,,
मन में जाने है कैसा भय
और खण्ड खण्ड होता ये ह्रदय,,,,,
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