मेरी पहचान अजीब है,,
कुछ कटे फ़टे कपड़ो में कही,,,
अंजान सा बेजान सा,,,
कभी किसी कोने में,,,
तो कभी खुले आसमा के तले,,,
मिल जाऊँगा अँधेरी ठिठुरती रातो में तुम्हे,,
सड़क किनारे फुटपाथ पर हर कही,,
इसीलिए शायद मेरी पहचान,,,,अजीब है,,
इसिलिए शायद लोग कहते मुझे गरीब है,,,
हाँ जब ठंड बढ़ती है,,,
तो मुझ जैसो की मुश्किल बढ़ जाती है,,,
कभी कभी सोते हुए,,,नींद नही आती है,,,
सिकुड़ते रहते है अपने ख्यालो में कही,,,
जाने क्यों राते सदियो से लम्बी हो जाती है,,,
और कभी कभी तो ये इतना कहर ढाती है,,,
जिसमे साँसे मेरी थम जाती है,,,
इसीलिए शायद हमारी किश्मत भी अजीब है,,,
इसीलिए शायद मेरी पहचान,,,,अजीब है,,
इसीलिए शायद लोग कहते मुझे गरीब है,,,
हाँ ये दुनिया वाले कभी कभी मेहरबान होते है,,,
जब हम दिखते है टेलीविज़न पर,,,
तब शायद ये नेता हम पर मेहरबान होते है,,,
हाँ हमे भी खूब पता है यारो,,
कैसे हमारा मजाक ये बनाते है,,,
कभी ये एक रात गुजारते है हमारी झोपडी में,,,,
और खुद महान बनते है,,,
कभी हमारे कटे फ़टे कपड़ो को,,,
चुनाव निशान कहते है,,,,
कभी कभी हमे अपना भाईजान कहते है,,,
लेकिन हमें भी पता है,,,
यही हमारा नसीब है
इसीलिए शायद मेरी पहचान,,,,अजीब है,,
इसीलिए शायद लोग कहते मुझे गरीब है,,,
No comments:
Post a Comment