Friday, November 9, 2018

कुछ शब्द है,,,कुछ निःशब्द है,, मेरे मन के शब्दकोश में,,

कुछ अनछुए से शब्द है
मेरे मन के शब्दकोश में,,
जो छूना चाहते है,,
इस असीमित आकाश को।।
इक पँछी की तरहा,,
चारों दिशाओं में,,
निर्बाध रूप से,,
उड़ना चाहते है,,
कुछ शब्द है,,,कुछ निःशब्द है,,
मेरे मन के शब्दकोश में,,
कभी ज्वार जैसे उठते है,,
कभी झकझोर देते है,,
कभी समंदर सी उठती लहरें,,
तो कभी ,,सभी सीमाएं तोड़ देते है,,,
फिर भी इनमें सब्र है
कुछ शब्द है,,,कुछ निःशब्द है,,
मेरे मन के शब्दकोश में,,
इनमे भावनाये भी,,
असीमित कल्पनाएं भी,,
अनछुये एहसास भी।।।
इक तड़पती प्यास भी,,,,
मन का ये पनघट है,,,
जो कुछ टूटा,,
तो कुछ बिखरा सा,,
इस हृदय ने समेटे,,
ना जाने कितने दर्द हैं

कुछ शब्द है,,,कुछ निःशब्द है,,
मेरे मन के शब्दकोश में,,
कुछ अनछुए से शब्द है
मेरे मन के शब्दकोश में,,
जो छूना चाहते है,,
इस असीमित आकाश को।।

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EARTHCARE FOUNDATION NGO
www.earthcarengo.org

Saturday, October 27, 2018

जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई, मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs.3000 की घड़ी पहनू या Rs.30000 की दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी.!

जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई, मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs.3000 की घड़ी पहनू या Rs.30000 की दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी.!

मेरे पास Rs.3000 का बैग हो या Rs.30000 का इसके अंदर के सामान मे कोई परिवर्तन नहीं होंगा। !

मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा।!

आख़ीर मे मुझे यह भी पता चला कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करू या इक्नामी क्लास मे, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा।!

इसीलिए _ अपने बच्चों को अमीर होने के लिए प्रोत्साहित मत करो बल्कि उन्हें यह सिखाओ कि वे खुश कैसे रह सकते हैं और जब बड़े हों, तो चीजों के महत्व को देखें उसकी कीमत को नहीं....

फ्रांस के एक वाणिज्य मंत्री का कहना था,
*ब्रांडेड चीजें व्यापारिक दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होती हैं जिनका असल उद्देश्य तो अमीरों से पैसा निकालना होता है लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं*।

क्या यह आवश्यक है कि मैं Iphone लेकर चलूं फिरू ताकि लोग मुझे बुद्धिमान और समझदार मानें?

क्या यह आवश्यक है कि मैं रोजाना Mac या Kfc में खाऊँ ताकि लोग यह न समझें कि मैं कंजूस हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं प्रतिदिन friends के साथ उठक-बैठक Downtown Cafe पर जाकर लगाया करूँ ताकि लोग यह समझें कि मैं एक रईस परिवार से हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Gucci, Lacoste, Adidas या Nike के पहनूं ताकि high status वाली कहलाया जाऊँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ ताकि सभ्य कहलाऊं?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Adele या Rihanna को सुनूँ ताकि साबित कर सकूँ कि मैं विकसित हो चुका हूँ?

_नहीं दोस्तों !!!

मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं,
Friends के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ,

भुख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने मे भी कोई अपमान नहीं समझता,

अपनी सीधी सादी भाषा मे बोलता हूँ। चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ जो ऊपर लिखा है।।

_लेकिन ....

मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो एक branded जूतों की जोड़ी की कीमत में पूरे सप्ताह भर का राशन ले सकते हैं।

मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं जो मेरे एक Mac बर्गर की कीमत में सारे घर का खाना बना सकते हैं।

बस मैंने यहाँ यह रहस्य पाया है कि पैसा ही सब कुछ नहीं है जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं वह तुरंत अपना इलाज करवाएं।

मानव मूल की असली कीमत उसकी _नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सहानुभूति और भाईचारा है_। ना कि उसकी मौजुदा शक्ल और सूरत. !!!

सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति मे मेरी जगह कौन कार्य करेगा?
समस्त विश्व मे सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी  कोने से एक आवाज आई।
दीपक ने कहा "मै हूं  ना" मै अपना पूरा  प्रयास  करुंगा ।

आपकी सोच में ताकत और चमक होनी चाहिए। छोटा -बड़ा होने से फर्क  नहीं पड़ता,सोच  बड़ी  होनी चाहिए। मन के भीतर एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहें।ध्यान करें,,, औरों को भी प्रेरित करें। जिससे हम सभी मैं सही सोच विकसित हो।।

Friday, October 26, 2018

भाई शशांक जी की वाल से साभार

,

मोदी पर क्रोधित होकर नोटा दबाने की चाहत रखने वाले यह पोस्ट अवश्य पढ़ें :-

Atrocities Act कहो या SC-ST एक्ट या फिर हरिजन एक्ट...
यह पेश किया गया था 11 सितंबर 1989 को.....
लागू करने वाली पार्टी थी 414 सीटों वाले अपार बहुमत की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस .....
इसकी नियमावली बनी 1990 से लेकर 1994 के बीच तक ...
जब पूर्व कांग्रेसी वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री थे.... जनता दल वाले......
लेकिन नियमावली बनकर लागू हुई 31 मार्च, 1995 को....
लागू करने वाली पार्टी बनी फिर से आपकी चहेती पी वी नरसिंहराव के नेतृत्व वाली काँग्रेस जिसे आपने दी 244 सीटें....

इस दौरान आपने इस क़ानून के लिये कोई आंदोलन नहीं किया....
कोई विरोध नहीं किया.... आप सोये रहे....
तब आपको पता नहीं चला कि यह क़ानून एक अभिशाप साबित हो सकता है......
सब मस्त चल रहा था.....
बल्कि जिस पार्टी ने लागू किया उसे हम लगातार सत्ता सौंप रहे थे....
खूब प्यार लुटा रहे थे.....

मैंने इस कानून को डिटेल में पढा....
सब कुछ IPC की धाराओं वाले ही अपराध इसमें है....
लेकिन यहाँ अग्रिम जमानत नहीं है....
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की बात है...
कड़ाई ज्यादा है.....
FIR दर्ज होते ही जेल है।

इस कानून के पीछे के कारण क्या बताये गये थे?....
क्या आधार रखे गये थे?..
आजादी के बाद कई जगहों पर दलितों के साथ हुए नरसंहार.....
उनके साथ छुआ छूत और भेदभाव का रवैया.....
उनका विभिन्न तरह से उत्पीड़न...
जिसे रोकने में हमारी आम न्याय व्यवस्था असफल साबित हुई...

ध्यान रहे कि यह मैं अपने विचार नहीं बता रहा इस कानून के अस्तित्व में लाने के पीछे जो तर्क दिये गये थे बस वह रख रहा हूँ जिससे न तो मैं पूरी तरह सहमत हूँ न ही असहमत....

अगर कानुन व्यवस्था असफल हुई थी तो इसमें आमजन का क्या दोष है भाई?...
कांग्रेस शासित 43 वर्षों के कुशासन व गलतियों की सजा आमजन क्यूँ भुगते? ....
लेकिन अगर तब ही कड़ा विरोध कर दिया गया होता तो आज यह नौबत न आती.....
और असल में अगर एक बात कहूँ और बिना विचारे बुरा न लगे तो यह कानून और इसकी धाराएँ बहुत बुरी भी नहीं हैं....

लेकिन हां इसका दुरूपयोग करना देश के किसी भी दूसरे कानून से ज्यादा आसान है....
और आंकड़े गवाह हैं कि इसका सदुपयोग से ज्यादा दुरूपयोग ही हुआ है....
बेकसूर ही सबसे ज्यादा फँसे है इस कानून के चपेट में.....

लेकिन उतनी ही बड़ी सच्चाई यह भी है कि शहरी दलितों के अलावा.... अधिकतर तौर पर इस कानून का दुरूपयोग करने वाले भी हम सवर्ण और पिछड़ी जाति वाले ही हैं.....

केस दर्ज करवाने में चेहरा भले दलित का आगे किया जाता हो लेकिन उस दलित की पीठ पीछे कोई सवर्ण या पिछड़ा ही खड़ा मिलेगा।...
लेकिन कमाल की बात है कि आप अब तक खामोश थे!

काँग्रेस सरकार जाते जाते इस कानून को और कड़े करने का इंतजाम करके गयी थी.....
8 नवंबर 2013 को काँग्रेस ने इसे और कड़े करने वाले नियम इसमें जोड़े....
जिसे पास होते होते 2014 आ गया.....
और उसका बिल भी मोदी सरकार पर फटा......
लेकिन हम अब भी सोये हुये थे.....

इस पर अगर कोई असली पुरजोर आंदोलन हुआ तो वह किया 2016 में मराठा समाज ने....

जब कुछ दलितों ने मराठा बच्ची का बलात्कार किया था और उल्टा इस काले कानून का प्रयोग कर मराठाओं को ही फँसा दिया गया था.....
तब जाकर पूरे राज्य में आंदोलन हुआ था....
लेकिन अब यह आंदोलन भी राजनीति की भेंट चढ चुका है......
पर तब भी मराठाओं के अलावा समस्त सवर्ण समाज ...
OBC वर्ग सोया रहा.....

वह तो धन्यवाद दो सरकारी कर्मचारी डॉ महाजन का जो इस केस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गये.....
डॉ महाजन पर हरिजन एक्ट की धाराओं के तहत FIR दर्ज की गयी...
दरअसल हुआ यह था किसी दलित ने उनके दो जुनियरों के खिलाफ जातिसूचक शब्द कहने को आधार बनाकर sc-st act के तहत FIR दर्ज कराई, जिसे डॉ महाजन ने जांच के बाद झूठा पाकर रद्द करवा दिया...
अब उन दलित जी ने उन पर ही केस ठोक दिया....
डॉ महाजन बॉम्बे हायकोर्ट गये कोई सुनवाई नहीं हुई .....
फिर तब जाकर अंत में डॉ महाजन बॉम्बे हायकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गये.....

अब मामला State Vs Dr.Mahajan हो गया.....
जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस गोयल और जस्टिस युयु ललित ने SC-ST एक्ट के दुरूपयोग की बात मानी...
और नयी गाइडलाइन्स जारी की....

अब जाकर हममें हल्की फुल्की चेतना जागी.....
और सुप्रीम कोर्ट के जयकारे लगाने लगे.....

लेकिन भाई यह तो जान लो कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया है?...
उसने मुर्दे का मात्र एक बाल उखाड़ दिया और आपको लगा मुर्दा हल्का हो गया....
कानून आज भी जस का तस ही है....

बस सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि मामले की जाँच हफ्ते दस दिन में करो उसके बाद गिरफ्तारी हो.....

किसी सरकारी कर्मचारी पर उससे वरिष्ठ अधिकारी की मर्जी के बिना FIR दर्ज न हो....

अग्रिम जमानत मिले......

यह अग्रिम जमानत ही एकलौती बड़ी बात है....
लेकिन यह सब तो राज्य स्तर पर पहले भी हो ही रहा था....
मायावती तक ने बिना पूरी जाँच के गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी...
ताकि इसका दुरूपयोग न हो....
वैसे भी इस मामले में DSP लेवल के अधिकारी जाँच करते हैं तब ही कुछ होता है....

और सबसे जरूरी बात यह कि यह छूट भी केवल तब मिलेगी जब FIR किसी दलित को जाति सूचक अपशब्द कहने पर दर्ज किया जा रहा हो...
अन्य मामलों में तो कोई छूट नहीं है ना..?.....
अब इस हल्के फुल्के बदलाव से क्या बदलने वाला था ....
यह कानून तो रद्द होगा नहीं .....
कारण सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि आंकड़े साबित करते हैं कि दलितों पर अत्याचार और बढे हैं...
और किसी कानून का दुरूपयोग हो रहा है महज इस कारण से अगर किसी कानून को रद्द किया जाने लगा तो फिर इस देश में कोई कानून बचेगा ही नहीं...

कारण दुरूपयोग कौन से कानून का नहीं हो रहा है...?

अब बताओ इसमें मोदी की क्या गलती है.... ?

इस कानून को आये लगभग 30 वर्ष हो गये.....
जिसने इसे लाया उस पार्टी को आप अब तक इस 30 में से 20 वर्ष सत्ता सौंप चुके हो....
30 वर्ष में इसके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं किया......
सोये रहे....
और अपने इस निकम्मेपन का बिल मोदी पर फाड़ रहे हो.....
क्या मोदी जी ने कहा था मैं सत्ता में आऊँगा तो इस कानून को रद्द कर दूँगा .... ?

आप लोग तो आजकल ऐसे व्यवहार कर रहे हो जैसे सब मोदी जी का किया धरा हो....
आप लोग 30 वर्ष तक सोये रहे....
वहीं दलित वर्ग में लगातार उग्रता का प्रसार किया जा रहा था क्योंकि उनके भोलेपन का फायदा उठाकर उनकी भावनाओं को उभारकर देश को टुकड़ों टुकड़ों में विभाजित करने का सपना देखने वाले लोग लगातार जहर घोल रहे थे.....

शांतिदूतों के संगठन, वामपंथी गिरोह, ईसाइ मिशनरियां और समस्त देश को खंड खंड देखने का सपना देखने वाली शक्तियों को सबसे मजबूत कंधा आज के दौर में दलित के रूप में मिल गया था....

दलितों को भड़काने वालों का नेक्सस किस तेजी से काम कर रहा है इसका जीता जागता उदाहरण है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के दो दिन के अंदर देशव्यापी प्रोपेगंडा से भड़का कर ऐसी आगजनी कराई गई जैसे यह आगजनी किसी दुश्मन देश में की जा रही हो...
और जैसे इस आगजनी की भेंट चढ़ी सरकारी अथवा सार्वजनिक संपत्ति से उन्हें कोई सरोकार नहीं है..!
उन्हें ऐसे भड़काया गया जैसे सरकार द्वारा न्यायालय के साथ मिलकर इस कानून को ही खतम कर दिया गया हो.....
दो अप्रैल को देशभर में एक ही शैली में आगजनी की गई जो कि इन दलितों के दिमाग की उपज नहीं हो सकती ... हो सकता है वह एक वर्ग से नाराज़ रहे हों लेकिन जिस सरकारी संपत्ति का सबसे ज्यादा लाभ उनको ही मिल रहा हो उसको वह इस शैली में नष्ट नहीं कर सकते थे ...

इस आगजनी को शारीरिक रूप से अवश्य उन भ्रमित दलितों बंधुओ द्वारा किया जा रहा था लेकिन उस आंदोलन का नेतृत्व व उनके दिमागों को संचालित वामपंथी तथा कांगियों द्वारा ही किया जा रहा था...!

वरना जाट आरक्षण आंदोलन, गुज्जर आरक्षण आंदोलन, करनी सेना आंदोलन, किसान आंदोलन व मराठा आरक्षण आंदोलन में की गई हिंसा व आगजनी तरीका एक ही प्रकार का कैसे रहा है?

हां सरकार ने दो अप्रैल को शुरू हुए इस प्रपोगेंडा की हवा निकाल कर रख दी....
वरना देश भर में दलितों के आड़ में छिपकर भयंकर तांडव मचाने की साजिश बन चुकी थी।

अब आप सरकार की इस मजबूरी को न समझते हुये अगर इसके खिलाफ माहौल बनाना चाहते हो तो क्या कर सकते हैं!!!
जिस पार्टी अथवा एक नेक्सस द्वारा शाजिसन देश को वर्ग के आधार पर विभाजित करने वाले इस कानून को लागू किया गया उसको ही आप जाने अनजाने मजबूत कर रहे है ?

जिस पार्टी ने वोट बैंक के लिये इस कानून को लागू किया वह ज्यादा बड़ी अपराधी है या जिसने अराजकता व वर्ग विभाजन से देश को बचाने के लिये इस बदलाव को वापस पहले की तरह बहाल किया वह दोषी है?

अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
प्रपोगेंडा में न बहें।
बाकी अगर इस कानून को लाने वाली पार्टी को इनाम देने की ठान ही ली है, तो ऑल द बेस्ट.....
और मोदी जी हटते ही ऐसे ही देश को गर्त में धकेलने के लिए कांग्रेस के महत्वाकांक्षी बिल "सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम एवं लक्षित हिंसा (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011" जैसे और भी नये नये कानून देखने के लिये NOTA ही दबायें...

Monday, October 15, 2018

व्यथाएँ बहुत मेरे मन मे सजन अश्रुपूरित छलक रहे विरह में नयन

हैं व्यथाएँ बहुत मेरे मन मे सजन
अश्रुपूरित छलक रहे विरह में नयन
मृगमरीचिका सी पास आती कभी
पल में धूमिल हो जाती हो तुम्ही
बनके मुरली मनोहर की वो मधुर तान छेड़ो,,
रह ना पाए अलग तुझसे,,जो,,थकित है ये मन,,

हैं व्यथाएँ बहुत मेरे मन मे सजन
अश्रुपूरित छलक रहे विरह में नयन,,,,,

क्या सोचूँ ,,,ना पाऊँ,,
जाऊ तो,,कहाँ जाऊ,,
ये लताएँ,, ये उपवन,,
ये गऊ वे ये ग्वाले,,
विरह में सब दुःखी है,,
इक झलक तो दिखाओ,,
मेरे मुरली मनोहर,,,मेरे ,,,श्याम सुंदर
इस कालरात्रि में,,कुछ दरस तो दिखाओ,,,,
हर कही कालिया है,,

हर कही कंस है,,तो कही जरासन्ध
हैं व्यथाएँ बहुत मेरे मन मे सजन
अश्रुपूरित छलक रहे विरह में नयन

जय श्री कृष्ण,,,,,
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Friday, October 12, 2018

अपना हिन्द महान हो इसके लिए कोई नही लड़ रहा

कभी हार के लिए लड़ रहे हैं
कभी जीत के लिए,,
कभी प्यार के लिए लड़ रहे है,,
कभी नफ़रत के लिए,,
कभी हिन्दू के लिए लड़ रहे
कभी मुसलमान के लिए,,
कभी कुर्सी के लिये लड़ रहे
कभी अपनी मर्जी के लिए
कभी अहंकार में लड़ रहे है
कभी सच के प्रतिकार के लिए,,
भाई भाई से लड़ रहे,,
बेटे ,,माँ बाप से,,
कभी महाराष्ट्र के लिए लड़ रहे
कभी गुजरात के लिए,,
कभी आग के लिए लड़ रहे
कभी प्यास के लिए
कभी आतंकवादी जिंदाबाद के लिए लड़ रहे
तो कभी हिंदुस्तान मुर्दाबाद के लिए

लेकिन,,, ???????
सीमा पर गोली खानेवाले जवान के लिए
कोई नही लड़ रहा,,
शिक्षा और विकाश के लिए
कोई नही लड़ रहा
बदतमीजी या बलात्कार के विरूद्ध
कोई नही लड़ रहा
गरीब किसान के लिए
कोई नही लड़ रहा
अपना हिन्द महान हो इसके लिए
कोई नही लड़ रहा
,,,,,,,,,

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Tuesday, September 25, 2018

बस 1 मिनट हाथ की उँगलियों को रगड़ने से शरीर का दर्द गायब हो जाता है।

बस 1 मिनट हाथ की उँगलियों को रगड़ने से शरीर का दर्द गायब हो जाता है।

संवेदनशीलता की प्राचीन कला के अनुसार प्रत्येक उँगली विशेष बीमारी और भावनाओं के साथ जुड़ी होती  है। हमारे हाथ की पाँचों उँगलियाँ शरीर के अलग- अलग अंगों से जुड़ी होती हैं। इसका मतलब आपको दर्द नाशक दवाइयाँ खाने की बजाय इस आसान और प्रभावशाली तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए। आज इस लेख के माध्यम  से हम आपको यह बतायेंगे कि शरीर के किसी हिस्से का दर्द सिर्फ़ हाथ की उँगली को रगड़ने से कैसे दूर होता है ?

हमारे हाथ की अलग-अलग उँगलियाँ अलग-अलग बीमारियों और भावनाओं से जुड़ी होती हैं। 
शायद आपको पता न हो , हमारे हाथ की उँगलियाँ, चिंता, डर और चिड़चिड़ापन दूर करने की क्षमता रखती हैं। उँगलियों पर धीरे से दबाव डालने से शरीर के कई अंगों पर प्रभाव पड़ेगा ।

आइये हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि कैसे हाथ की उँगलियों को रगड़ने से, दूर हो सकता है शरीर का दर्द ?

1. अँगूठा(अंगुष्ठ)Thumb-  हाथ का अँगूठा हमारे फेफड़ों से जुड़ा होता है।अगर आपके दिल की धड़कन तेज़ है, तो हल्के हाथों से अँगूठे की मालिश करें और हल्का सा खींचें। इससे आपको आराम मिलेगा।

2. पहली उँगली(तर्जनी) Index (ForeFinger)- यह उँगली आँतों ( gastro intestinal tract) से जुड़ी होती है।
अगर आपके पेट में दर्द है, तो इस उँगली को हल्का-सा रगड़े, दर्द कम होता महसूस होगा।

3. बीच की उँगली(मध्यमा) Middle Finger- यह उँगली परिसंचरण तंत्र (circulation system) से जुड़ी होती है । अगर आप को चक्कर आता है या आपका जी घबरा रहा है, तो इस उँगली पर मालिश करने से तुरंत राहत मिलेगी।

4. तीसरी उँगली(अनामिका) Ring Finger- यह उँगली आपकी मनोदशा से जुड़ी होती है। अगर किसी कारण आपकी मनोदशा अच्छी नहीं है ,या शाँति चाहते हैं, तो इस उँगली की हल्की-सी मालिश करें और खींचें ,आपको जल्द ही इसके अच्छे नतीजे प्राप्त हो जायेंगे ,आपका मन खिल उठेगा।

5. छोटी उँगली(कनिष्ठिका) Little Finger- छोटी उँगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है।
अगर आपके सिर में दर्द है, तो इस उँगली को हल्का सा दबायें और मालिश करें, आपका सिर दर्द गायब हो जायेगा। इसकी मालिश करने से किडनी भी तंदुरुस्त रहती है और हम स्वस्थ।

इसके साथ-साथ आज में जीने की कोशिश करें, कल अपने आप सुधरता जाएगा।
                     शुभमस्तु !
                                      --प्रतापनारायण मिश्र

Friday, September 14, 2018

अगर आप पेट भरने के लिए मांस भक्षण करते हैं तो यह बेशक आपका "भोजन के चुनाव" का अधिकार है। .

अगर आप पेट भरने के लिए मांस भक्षण करते हैं तो यह बेशक आपका "भोजन के चुनाव" का अधिकार है।
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अगर आप "मेरी किताब में ऐसा लिखा है" सोचकर ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए छोटे-छोटे बच्चों के हाथ मे चाकू देकर सरेआम जानवरों को जिबह करके हत्या का सामूहिक उत्सव मनाते हैं तो मेरे दोस्त.. आप मानसिक तौर पर बहुत बीमार हैं।
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अगर आप कहते हैं कि आपकी हजारों साल पुरानी किताब की किसी बात पर उँगली नही उठाई जा सकती तो इसे "आतंकवाद" कहते हैं।
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और जो आतंकवाद के पोषण की इस मानसिकता को कौम विशेष का संवैधानिक अधिकार बता कर समर्थन करते हैं...
वे इस धरा के सबसे बड़े "बौद्धिक आतंकवादी" हैं।
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विशेष नोट: भारत के लिए सबसे बड़ा नासूर सेलेक्टिव सेकुलरिज्म धारण करने वाले बौद्धिक आतंकवादी ही हैं।
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- झकझकिया

Wednesday, August 22, 2018

सभी रिश्तों को समर्पित

क्यूँ ना हम कुछ लम्हों के लिए सब कुछ भूल कर
अपनों को दिल से सुने
अपनो से बातें करें
अपनो के बीच कुछ पल बिताएं,,
अपनो से कभी रूठे,,
तो,,,अपनो को कभी मनाएं,,
क्योंकि ज़िन्दगी भी तो चार पल की ही है,,,
तो इन अमूल्य पलों को हम क्यों गवाएं,,,
नही तो ये रिश्ते धूमिल हो जाएंगे,,
इन पर समय की धूल चढ़ गई तो?????

इसलिए अपनो को समय दे,,,
अगर रिश्तों को,,
समाज को,,
शहर को ,,,
जीवंत रखना है,,,,

सभी रिश्तों को समर्पित

आपका कोई अपना
Nirmal earthcarefoundation ngo

अपना कर्तव्य जाने

*ऐश्वर्या राय* किसी साबुन को प्रमोट करे, तो हम लोग ख़रीद लेते हैं,
*शिल्पा शेट्टी* किसी ब्रेकफ़ास्ट को प्रमोट करे, तो हम लोग ख़रीद लेते हैं,
*ह्रितिक रोशन* कोई Deo लगाए, तो हम लोग वो ले आते हैं,
*जॉन अब्राहम* कोई हैल्थ ड्रिंक प्रमोट करे, तो हम लोग उसे पीने लग जाते हैं!

ऐसे *अनगिनत उदाहरण* हैं..

*लेकिन.. लेकिन.. लेकिन..*

अगर हमारा कोई *दोस्त या रिश्तेदार* कोई नया बिज़नेस शुरू करे तो *हम लोग नहीं लेते।* हम कहते हैं *"इस पर रिसर्च करूँगा"* या *"महँगा है"!!*

*क्यों हम जल्दी से उन्हें सपोर्ट करते हैं जिन्हें हम जानते नहीं, जिनके पास अथाह पैसा है???*

जबकि *हमारे पास हज़ारों कारण होते हैं उसे सपोर्ट "नहीं" करने के लिए* जिसे *हम जानते हैं और जो हमारी तरह ही साधारण जीवन जी रहा है!*
जब आप ऐसे किसी अपने जानकार को *सपोर्ट* करते हैं तो आप *अपने जैसे ही किसी को आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने का मौका देते हैं।*
न कि किसी *सेलिब्रिटी* के *अंतहीन बैंक बैलेंस* को और बढ़ाने का काम करते हैं।

*अपनी सोच बदलिये,* अपने मित्रों और पहचान वालों को *सबसे पहले* प्रमोट कीजिये।

👍🏻👍🏻🤝🏻🙏🏻

Saturday, July 28, 2018

प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े अनसुने तथ्य

प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े अनसुने तथ्य
●Untold Truth Of Plastic Pollution●
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पिछले दिनों सरकार ने 50 माइक्रोन से पतली प्लास्टिक पन्नी पर बैन लगा दिया है जिसको लेकर सरकार पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हुए पूछा जा रहा है कि सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्लास्टिक पैकेजिंग पर अथवा प्लास्टिक के अन्य उत्पादों पर बैन क्यों नही लगाया है। मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े तथ्यों का समग्रता से ज्ञान नही है। प्लास्टिक से जुड़े कुछ अनकहे-अनसुने तथ्य बताती इस पोस्ट को पढिये तथा कृपया अपने मित्रों से साझा करें।
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पिछले 100 वर्षों में हम लगभग 83 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन कर चुके हैं। जिसमें से लगभग 63 अरब टन प्लास्टिक बेकार हो चुका है। अगर इस प्लास्टिक का ढेर बनाया जाये तो इसकी ऊंचाई, चौड़ाई और लंबाई की माप लगभग 2 किलोमीटर (Each Side) होगी।
इस 63 अरब में से 21% प्लास्टिक रीसायकल अथवा नष्ट किया जा चुका है। तो बाकी 79% का क्या किया जाए?
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चूंकि प्लास्टिक सामान्यतः डिग्रेड होने में 1000-500 वर्ष का समय लेता है इसलिए कचरा भंडारों अथवा लैंडफिल्स में इस प्लास्टिक को वर्षों तक सड़ने के लिए छोड़ना जमीन और वक़्त दोनों की बर्बादी है।
तो बेहतर उपाय क्या है?
दुनिया मे कई देश कोयले अथवा नेचुरल गैस की बजाय प्लास्टिक को जला कर प्राप्त ऊष्मा से अपनी बिजली जरूरतें पूरी कर रहे हैं इसलिए प्लास्टिक का सबसे बेहतर उपयोग प्लास्टिक को जलाना ही है। (यहां घर पर प्लास्टिक जलाने की बात नही हो रही है)
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अब आप कहेंगे कि प्लास्टिक को जलाने से हानिकारक कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस भी निकलती है। उसका क्या?
ये सच है कि प्लास्टिक को जलाने से प्रति मेगावाट लगभग 2988 पाउंड CO2 उत्पन्न होती है जो कि कोयले (2249 पाउंड) और नेचुरल गैस (1135 पाउंड) के मुकाबले काफी ज्यादा है।
फिर भी... प्लास्टिक को जलाना बेहतर इसलिए है क्योंकि... प्लास्टिक को जला कर आप वो CO2 मुक्त करते हैं जो पहले से ही वातावरण में मौजूद थी।
पर कोयले को जलाने से आप वो कार्बन मुक्त करते हैं जो करोड़ों वर्षों से जमीन के नीचे बन्द था (इसलिए कोयले को जलाने से हवा में कार्बन की नेट मात्रा बढती है, प्लास्टिक को जलाने से नही)
प्लास्टिक को जलाने से कुछ हानिकारक टॉक्सिन्स भी उत्पन्न होते हैं लेकिन वर्तमान रीसायकल प्लांट उनके शोधन में पूर्णतः सक्षम हैं।
इसके अलावा प्लास्टिक को जलाना इसलिए भी बेहतर है क्योंकि कचरा भंडारों में मौजूद बैक्टीरिया इस प्लास्टिक को डिग्रेड कर एक ऐसी गैस उत्पन्न करते हैं जो कार्बन के मुकाबले 25 गुना पृथ्वी को गर्म करने में सक्षम है।
यस... मीथेन !!!!
.
तो हो गया फैसला... जब प्लास्टिक को आराम से जलाया जा सकता है तो प्लास्टिक के नाम पर इतना हंगामा क्यों किया जाता है?
जवाब यह है कि... हमारी आदतें खराब हैं।
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प्लास्टिक के निस्तारण की विधियां मौजूद होने के बावजूद दुनिया के कई देश इस दिशा में कोई कदम नही उठा रहे हैं और अपने प्लास्टिक कचरे को गैरजिम्मेदाराना तरीके से नदियों में प्रवाहित कर देते हैं, जहां यह कचरा जाकर समुद्र में जमा होता जाता है और इस कचरे को खाने के कारण मत्स्य प्रजातियों के अस्तित्व पर गम्भीर संकट खड़े हो गए हैं।
इस प्लास्टिक प्रदूषण के 90% जिम्मेदार भारत और चीन नामक दो राष्ट्र हैं। बढ़ती जनसंख्या के बोझ के बीच हमनें खूबसूरत आशियानें बना लिए, लोगों को बेहतर जीवन मुहैया कराया पर अपने कचरे को निपटाने के तरीकों पर कोई कदम नही उठाया और गैरजिम्मेदारी से अपने कचरे को नदियों में प्रवाहित करते रहे।
और आज हमारी बेवकूफियों की कीमत समुद्री प्रजातियों को जान देकर चुकानी पड़ रही है।
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तो सरकार ने 50 माइक्रोन से पतली पन्नी पर ही बैन क्यों लगाया है?
वो इसलिए क्यूंकि... बेहद पतले प्लास्टिक शीट से प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों का क्षय होता रहता है और वातावरण में तैरते ये प्लास्टिक के कण हमारी साँसों के माध्यम से हमारे शरीर के अंदर जाकर नुकसान पहुंचाते हैं। समुद्र में तैर रही प्लास्टिक से सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के कारण सूक्ष्म कणों का क्षय होता रहता है। कई सर्वेक्षणों के अनुसार समुद्र में इस समय लगभग 51 ट्रिलियन (51 के बाद 12 जीरो) सूक्ष्म प्लास्टिक कण मौजूद हैं। ये कण समुद्री प्रजातियों द्वारा भूलवश खा लिए जातें हैं और चूंकि ये समुद्री प्रजातियां हमारे डिनर प्लेट का हिस्सा भी होती हैं जिस कारण यह प्लास्टिक घूम फिर कर हमारे शरीर मे ही पहुंच रहा है और कैंसर जैसे असाध्य रोगों को जन्म दे रहा है।
कई सर्वेक्षणों में 93% लोगों के मूत्र सैंपल में प्लास्टिक के कण पाए गए हैं।
इससे भयावह स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल है।
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तो प्लास्टिक पर पूरी तरह बैन लगा दिया जाए?
हम्म.. देखा जाए तो यह भी मूर्खता ही होगी। हमारे पास प्लास्टिक से बेहतर और सस्ता विकल्प फिलहाल मौजूद नही है।
एक कॉटन के बैग को बनाने की प्रक्रिया में हुआ प्रदूषण एक प्लास्टिक बैग के मुकाबले 7000 गुना ज्यादा होता है।
इसके अलावा हमें याद रखना होगा कि दुनिया की आधी आबादी आज भी पैकेजिंग फ़ूड पर पलती है। प्लास्टिक के अतिरिक्त कोई विकल्प नही है जो लंबे समय तक भोजन को सड़ने से बचा कर जीवाणुमुक्त रख पाए।
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प्लास्टिक को समस्या समझने की बजाय बेहतर शोधों और प्लास्टिक के निस्तारण पर ध्यान देने की जरूरत है।
और उससे भी जरूरी है अपनी आदतों को सुधारना
क्योंकि.. इतिहास गवाह है कि विज्ञान और तकनीक इंसान का विनाश नही करती।
हमारा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और आदतें ही पृथ्वी की समस्त समस्याओं का मूल हैं।
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It's Time To Behave Like A Smart Ape !!!
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#झकझकिया