Friday, May 26, 2017

फिर ये अंतर क्यूँ,,,,,

जब भी हम किसी जाति,,, या धर्म की उन कुरीतियों के सम्बन्ध में बात करते हैं जो समाज को अंधविस्वास के कच्चे धागे से हमको बांधकर रखती है,,,जिनसे एक विशेष वर्ग को फायदा पहुचाने के लिए कुछ धर्म के ठेकेदार उन बातों या विचारो का विरोध करते है,,,,जो समाज हमेशा ही पुरुष प्रधान रहा है ,,,,वहां पर स्त्रियों को दासी या अपनी इच्छाओं को पूरी करने का साधन मात्र समझते हैं,,,अथवा घर की चारदीवारी में बंद करने वाली वस्तु मात्र ,,,जिसको मात्र वो जैसे चाहे उपयोग कर  सके ,,,ऐसी ही कई कुप्रथाएं प्रचलित है जिनसे हमारा पुरुषप्रधान समाज ग्रस्त है,,,
इनका अंत होना चाहिए ,,,,
क्योकि
औरत ही माँ है
औरत ही बहन है
वही हमारी बेटी भी है
उन्ही के रूप को जगजननी के रूप में पूजते है
फिर ये अंतर क्यूँ,,,,,

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